कविता

कविता

वीर बांकुरों बढ़कर तोड़ो दुश्मन का भरम

वन्दे मातरम, वन्दे मातरम...

बुरी नजर दुश्मन की सीमा पर न कभी पडने देना

नहीं दूब आतंकी पावन माटी में जमने देना

रौंद-रौंद कर पैरों से तुम करते रहो खत्म

वन्दे मातरम, वन्दे मातरम...

दुश्मन की तोपों का रूख फौलादी सीनों से मोड़ो

बुरे इरादों वाले चक्रव्यूह को पल भर में तोडों

कभी दुष्ट की बदकारी को करना नहीं हजम

वन्दे मातरम, वन्दे मातरम...

हिमगिरी है अभिमान हमारा मां के सर का ताज है

महक रहा कश्मीर जहां कण-कण के सर था राज है

भ्रष्टों और दलालों का मत होने दो जन्म

वन्दे मातरम, वन्दे मातरम...

चलो डराते महाकाल को नागो से फुंकारते

राष्ट्रदेव की महा आरती निश दिन रहो उतारते

ठण्डा कभी न होने पाये रखना खून गरम

वन्दे मातरम, वन्दे मातरम...

- कमलेश कुमारी, इन्द्रा कालोनी, मुजफ्फरनगर

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