गजल

गजल

मैंने तो सिर्फ आपसे प्यार करना चाहा था

खाहिश-ए-खलीक इजहार करना चाहा था

धुएं सी उड़ा दी आरजू पल में यार ने मेरे

तेरा इस्तिकबाल शानदार करना चाहा था

भले लोगों की बातें समझ न आईं वक्त पे

मैंने तो हर लम्हा जानदार करना चाहा था

तेरे काम आ सकूं इरादा था बस इतना सा

तअल्लुक आपसे आबदार करना चाहा था

इंतजार क्यूं करें फस्ल-ए-बहारां सोचकर

चमन ये 'राहत' खुशबूदार करना चाहा था

- रूपेश जैन 'राहत'

Share it
Top