कविता: परपीडऩ

कविता: परपीडऩ

कई लोगों को दूसरों को तकलीफ पहुंचा कर
विचित्र प्रकार के आनंद की अनुभूति होती है!
उनके पास इसका कोई कारण नहीं होता
कोई रंजिश, कोई दुश्मनी, कोई लाग डांट
दूर दूर तक किसी भी वजह का अस्तित्व नहीं होता!
वे ऐसा क्यों करते हैं इसका कारण तो शायद
मनोचिकित्सकों को भी बताने में कठिनाई हो!
शायद ऐसी उनकी जन्मजात प्रवृत्ति होती है
या शायद यह भी एक प्रकार का मनोरोग है
शायद अपने इस मानसिक विकार का आभास
या एहसास भी उन्हें नहीं होता होगा
पड़ोस में दो दिन पहले तीन नई कारें आई
उसी रात किसी ने उन पर किसी नोकदार
चीज से भद्दी भद्दी गालियां उकेर दी
कार मालिकों की परेशानी का अनुमान लगाना
अधिक मुश्किल नहीं है
ऐसा करने वाले को क्या हासिल हुआ
यह कह पाना भी सरल नहीं!
शायद परपीडऩ आनंद?
- ओमप्रकाश बजाज

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