कविता: औरत

कविता: औरत

पीड़ा जीवन भर सहती है,
औरत जब तक भी रहती है।
औरत जब पैदा होती है,
तब से मरने तक रोती है।
ये आंसू नियति रही सर्वथा,
जीवन ही सारा व्यर्थ अन्यथा।
मां के आंचल में खिलती है,
पीड़ा जीवन भर सहती है।
औरत जब तक भी रहती है।
पलती है बाबुल के घर में,
परिणय तक रहती पीहर में।
छूटे बाबुल का आंगन पर,
कब होता कोई अपना घर।
साजन के संग भी चलती है,
पीड़ा जीवन भर सहती है।
औरत जब तक भी रहती है।
कोख रचे इक नवजीवन को,
समझे कोई नारी मन को।
कितनी टीस उठाई होगी,
बेटी गर्भ में आई होगी।
दुनिया ताने देती रहती है,
पीड़ा जीवन भर सहती है।
औरत जब तक भी रहती है।
मां के सारे कर्तव्य निभाती,
ममता अपनी खूब लुटाती।
बेटा बेटी एक सरीखे,
कोई मां से ये भी सीखे।
कोई भेद न वो करती है,
पीड़ा जीवन भर सहती है।
औरत जब तक भी रहती है,..
बचपन में बाबुल का घर था,
ब्याह हुआ साजन का दर था।
जम्मी औलादें जिस आंगन में,
हक न वहां पाया जीवन में।
बूढ़ी मां भारी लगती है,
पीड़ा जीवन भर सहती है।
औरत जब तक भी रहती है।
- प्रीति सुराना

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