रेल का सफर

रेल का सफर

जंगल, जंगल छुक - छुक करती, चल दी अब रेल!
शहर - शहर और गाँव - गाँव, व्हिसल बजाती रेल!
पर्वत , नदिया , नाले और भाग रहे खेल के मैदान! !
घूम रहे तेजी से सब कुछ,
जैसे सर्कस के दरम्यान!
मूंगफली और गरम समोसे ,
यह वड़े पाव का खेल !
छुक- छुक करती मैराथन जैसी , दौड़ी जाती रेल ! !
कोहरे की चादर को,
चीरती आगे बढ़ती जाती रेल! !
स्टेशन को एक - एक करती,
पीछे छोड़े जाती रेल
काले कोट में टीटी अंकल,
सिर पर रखें देखो हैट !
सूट - बूट में टिकट - टिकट करते , देखो कितने फैट! !
खिड़की खोलो तो देखो,
जैसे नाच रहा है गाँव ! !
रेल पकडऩे को जैसे ,
पीछे भाग रहा है गाँव ! !
देश , प्रांत और भाषा का
भेद मिटाती अपनी रेल ! !
मेल - मिलाप और भाईचारा,
खूब बढ़ाती यह रेल !
सुंदर , सुखद , सुनहले , सफर कराती अपनी रेल !!
कम पैसे में और सुरक्षित,
पैसेंजर ले जाती रेल
- प्रभुनाथ शुक्ल

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