बाल कविता: खाना-खाना

बाल कविता: खाना-खाना

सोच कर देखें कि आप
खाना खाते हैं या निगलते हैं ?
कई लोग जल्दी जल्दी खाते हैं
वे खाना खाते नहीं, भकोसते हैं.
खाना खाने का भी एक सलीका है
हर कौर को 32 बार चबाना है.
जल्दी जल्दी खाने से वजऩ बढ़ता है।
शरीर कई रोगों का शिकार होता है।
मनुष्य भोजन का स्वाद नहीं ले पाता।
न ही वह खाने का आनन्द उठाता है।
वह तो जैसे एक काम ही निबटाता है।
या जैसे वह एक और फर्ज़ निभाता है।
- ओमप्रकाश बजाज

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