कविताः छटा हिन्द की

कविताः छटा हिन्द की

बदल गई है छटा हिन्द की, खुद को लज्जित पायेगा। सामाजिक पिंजरे में पीड़ित, हंस ना मोती पायेगा।। मन दर्पण तेरा धूमिल लगता, करता है ताक झांक यहां, घर शीशे के बावजूद भी, पत्थर फेंक रहा है यहां। टुकड़ा एक दिन पत्थर का, जब तेरे घर पर आयेगा, कंचन कोमल सी कलिया की, नींद उड़ा ले जायेगा। कलियों का आसन छूटेगा, भौरा संग ले जायेगा। समय के रहते ना संभला तो, कभी संभल नहीं पायेगा।। कुसंगत की राह अंधेरी, दाग जिगर लग जायेगा। सामाजिक पिंजरे में पीड़ित, हंस ना मोती पायेगा।। फैल रहा अज्ञान अंधेरा, काली अंधियारी छाई। आज उदासी घर-घर में है, तरूणा वापिस ना आई। स्वच्छंद किशोरी न्योता देती, जंगली व्याभिचारी को। फैशन के वश नग्न घूमती, भूली लाज कटारी को। झाड़ी की फसलें गली-गली में, कांटों से चुनरी उलझ गई। कलियां ना मुसका पाये जिस, तरू की शाखा झुलस गई। क्यों रौंदे कलिया का जीवन, फूलों से खुशबू पायेगा।। सामाजिक पिंजरे में पीड़ित, हंस ना मोती पायेगा।। निर्लज्ज बनी फिरे भिनभिनाती, भंवरे जोह रहे हैं बाट। चन्द लम्हों की चंचलता को, जीवन जंगल सा बरबाद। भंवरे कुत्सित वास प्रेम में, नोंच रहे हैं कली-कली। सामाजिक ताने-बाने को, खंडित करते गली-गली। सुन्दर और सलोना हो जीवन, अंतस मन पथ सदगामी बन। प्रेम की मूरत हो मर्यादित, माता-पिता की अनुगामी बन। अंधी गलियों में दीप जलाओ, फिर अंधकार मिट जायेगा।। सामाजिक पिंजरे में पीड़ित, हंस भी मोती पायेगा।।

-इन्द्रपाल सिंह, आदर्श कालोनी, मु.नगर

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