कविता: भारत

कविता: भारत

हैं एक अरब इंसान।

अपना भारत देश महान।।

हैं मन्दिर-मस्जिद-गुरूद्वारा,

प्यारा-प्यारा गिरिजाघर।

है प्यारी-न्यारी भाषाएं,

हर पांच कोस पर बदले स्वर।।

पढ़ते बाइबिल, वेद-कुरान,

हैं एक अरब इंसान।

अपना भारत देश महान।।1।।

हैं गंगा जी और जमुना जी,

है ताजमहल बड़ा अजूबा।

बस प्रीति की रीति यहां फैली,

है प्रकृति बनी महबूबा।।

जहां पत्थर भी भगवान,

हैं एक अरब इंसान।

अपना भारत देश महान।।2।।

सभ्यता यहां की न्यारी है,

यह माटी जान से प्यारी है।

सब विश्व एक परिवार बने,

यह संस्कृति हमारी है।।

हर प्राणी एक समान,

हैं एक अरब इंसान।

अपना भारत देश महान।।3।।

- दुर्गा प्रसाद शुक्ल 'आज़ाद'

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