कविता: दुमुंहे नेता

कविता: दुमुंहे नेता

दुमुंहे सांप ही नहीं

इंसान भी होते हैं।,

बल्कि सांपों से अधिक

इंसान ही होते हैं

ऐसे इंसान विषधरों से कहीं अधिक

खतरनाक भी होते हैं!

मुंह पर ठकुरसुहाती

पीठ पीछे बुराई करते हैं

ऐसा दोगलापन करते

जरा भी नहीं ठिठकते हैं

ऐसे दुमुंहे हर जगह हर समय

हर समूह में मिल जाते हैं

अपनी इस कमीनी हरकत को

वे दुनियांदारी बताते हैं

कई तथाकथित नेता

इस कला में कमाल दिखाते हैं

सार्वजनिक रूप से दिए अपने

वक्तव्यों से भी मुकर जाते हैं

यह अलग बात है कि

इलेक्ट्रानिक संचार माध्यमों के कारण

बच नहीं पाते हैं

झेंप कर रह जाते हैं

चुनावी आश्वासनों को भूल जाना

इनके लिए सामान्य बात है

बेशरमी ढीठपने में इन को

अद्भुत निपुणता प्राप्त है

दुष्कर और दु:साध्य है

दुमुंहों को पहचान पाना,

इनकी धूर्तता और नीचता का

समय रहते अनुमान लगाना!

- ओमप्रकाश बजाज

रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

Share it
Top