कविताः मूंछें

कविताः मूंछें

दादाजी की तगड़ी मूंछें,
पापाजी की खिचड़ी मूंछें।
पर अपने भैया हैं ऐसे,
जिनकी बिगड़ी-बिगड़ी मूंछें।।
दादा इन पर ताव दे रहे,
पापा इनमें चाव ले रहे।
लेकिन अपने भैया देखो,
है मूंछों के भाव ले रहे।।
काली और सफेद हैं मूंछें,
प्यारी-प्यारी न्यारी मूंछें।
असरदार और रोबदार हैं,
हमारी और तुम्हारी मूंछें।।
गलती कभी न होती माफ,
बात कह रही मूंछें साफ।
काम करो सोच समझकर,
वरना पछतायेंगे आप।।
-डा. दुर्गा प्रसाद शुक्ल 'आजाद'

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