कैग की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट को किया गया संसद में पेश.....राफेल सौदा 2.86 फीसदी सस्ता, रिपोर्ट में किया गया दावा- बेसिक विमान की कीमत में नहीं कोई अंतर

कैग की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट को किया गया संसद में पेश.....राफेल सौदा 2.86 फीसदी सस्ता, रिपोर्ट में किया गया दावा- बेसिक विमान की कीमत में नहीं कोई अंतर

नई दिल्ली। राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट आज संसद में पेश कर दी गई जिसमें कीमत का खुलासा किये बिना कहा गया है कि यह सौदा पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के समय किये गये सौदे से कुल मिलाकर 2.86 फीसदी सस्ता है, लेकिन इसमें सौदे के विवादास्पद पहलू ऑफसेट के बारे में कुछ नहीं कहा गया है और इसके बारे में अलग से रिपोर्ट तैयार की जा रही है। लगभग डेढ साल में तैयार की गई रिपोर्ट में राफेल विमानों के नये या पुराने सौदे की कीमतों का जिक्र नहीं किया गया है और इसके लिए फ्रांस सरकार के साथ भारत सरकार के गोपनीयता के समझौते का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट में सरकार के इस दावे को खारिज किया गया है कि यह सौदा वर्ष 2007 के सौदे से 9 फीसदी सस्ता है। साथ में कैग ने यह भी कहा है कि दोनों सौदों में बेसिक विमान की कीमत में कोई अंतर नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार नये सौदे विमानों की आपूर्ति एक महीने पहले होगी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विमान में भारतीय वायु सेना की जरूरत के हिसाब से अलग से लगवाई गई प्रणालियों में 17.08 फीसदी की बचत हुई है, लेकिन साथ में यह भी कहा गया है कि इनमें से चार जरूरतें ऐसी हैं, जिनकी आवश्यकता नहीं थी और इनकी कीमत अलग से लगवायी गयी प्रणालियों की कुल कीमत का 14 फीसदी है। वर्ष 2007 और 2016 के सौदों की तुलना करते हुए रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है, जहां पहले के सौदे में 15 फीसदी बैंक गारंटी की बात कही गयी थी वहीं दूसरे सौदे में बैंक गारंटी या सोवरियन गारंटी का प्रावधान नहीं है और इसकी जगह पर फ्रांसीसी सरकार ने भारत को एक सहुलियत पत्र दिया है। यही नहीं सौदे से जुड़ी राशि के भुगतान के लिए फ्रांस सरकार ने एस्क्रो अकाउंट खोलने के भारत के अनुरोध को भी अस्वीकार कर दिया। अब सौदे की राशि सीधी विक्रेता कंपनी को उसके खाते के माध्यम से की जा रही है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि सौदे से संबंधित कोई विवाद होने पर पहले इसका समाधान रक्षा मंत्रालय और विक्रेता कंपनी के बीच मध्यस्थता के जरिय किया जायेगा। यदि मध्यस्थता प्रक्रिया में फैसला भारत के पक्ष में आता है और फ्रांसीसी कंपनी इसको मानने से इंकार करती है तो भारत को पहले सभी कानूनी विकल्पों को आजमाना होगा और इसके बाद फ्रांस सरकार इस मामले में जरूरी पडऩे पर कोई भुगतान करेगी। रिपोर्ट में वायु सेना पर भी सवाल उठाते हुए कहा गया है कि उसने 'एयर स्टाफ क्वालिटेटिव रिकवायरमेंट' (एएसक्यूआर) को उचित तरीके से परिभाषित नहीं किया गया है। इसके परिणामस्वरूप कोई भी विक्रेता ए एसक्यूआर को पूरा नहीं कर पाता। खरीद सौदे के बारे में एएसक्यूआर को बार-बार बदला गया। इससे तकनीक और कीमत के मूल्यांकन को लेकर कठिनायी का सामना करना पड़ता है। इससे खरीद प्रक्रिया में बेवजह की देरी होती है। कैग रिपोर्ट में बिना कीमत का खुलासा किये लिखा गया है कि इस सौदे में भारतीय वायु सेना की जरूरत को देखते हुए विमान में अलग से लगवायी गयी प्रणालियों (इंडियन स्पेसिफीक इनहेन्समेंट) में 17.08 फीसदी की बचत हुई है, इंजीनयरिंग स्पोर्ट पैकेज पर 6.54 फीसदी ज्यादा खर्च हुआ है। इसी तरह परफोरमेंस आधारित साजो सामान पर भी 6.54 फीसदी अधिक खर्च किया गया है। हथियार पैकेज में 1.05 फीसदी की बचत हुई है। सेवा, ऑपरेशनल स्पोर्ट इक्वीमेंट और तकनीकी सहायता आदि पर 4.77 फीसदी की बचत हुई है। इस तरह तालिका के माध्यम से रिपोर्ट में बताया गया है कि कुल सौदा वर्ष 2007 के सौदे की तुलना में 2.86 फीसदी सस्ता है। भारतीय वायुसेना में पूँजीगत अधिग्रहण के बारे में संसद में रखी गयी यह रिपोर्ट दो भागों में है। पहले भाग में इस बात का विश्लेषण किया गया है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के समय शुरू की गयी खरीद प्रक्रिया में अंतिम समझौता क्यों नहीं हो सका। दूसरे भाग में मौजूदा सौदे की प्रक्रिया तथा अन्य बातों का विश्लेषण किया गया है। कैग के अनुसार पुराने सौदे के परवान नहीं चढऩे के दो कारण रहे। पहला यह कि यह काफी बड़ा ऑर्डर था और इसमें प्रौद्योगिकी हस्तांतरण भी होना था, इसलिए इसमें ज्यादा श्रमबल की जरूरत थी। दूसरा कारण बताया गया है कि पुराने सौदे में जो 108 विमान भारत में बनने थे उसके लिए राफेल विमान बनाने वाली कंपनी दासो एविएशन 'प्रदर्शन की गारंटी' देने के लिए तैयार नहीं था।

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