अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ न करें

अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ न करें

प्रसिद्ध व्यंग्य लेखक मार्क टवेन ने कहा था-बी केयरफुल अबाउट रीडिंग हैल्थ बुक्स। यू मे डाई आफ ए मिसप्रिन्ट, अर्थात स्वास्थ्य संबंधी पुस्तकें पढऩे में सावधानी बरतें क्योंकि छपाई की मामूली सी गलती भी आप की जान ले सकती है।

नीम हकीम को जान के लिए खतरा बताया गया है, स्व-उपचार सेल्फ-मेडिकेशन के लिए मनाही की जाती है। आधा अधूरा ज्ञान खतरनाक हो सकता है। मुझे याद है कि जब मैं इंश्योरेंस की एक विभागीय परीक्षा के लिए सामान्य रोगों की जानकारी हेतु अध्ययन कर रहा था तो लगभग हर रोग के लक्षण मुझे अपने में नजर आते थे।

इधर कुछ समय से अपने यहां हेल्थ कांशियसनेस (स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता) कुछ अधिक देखने में आ रही है। इस का एक परिणाम यह हुआ है कि हर भाषा की पत्र-पत्रिकाओं में स्वास्थ्य तथा फिटनेस संबंधी लेखों की एक बाढ़ सी आ गई है। साथ ही साथ देशी इलाज, घरेलू नुस्खे, दादी मां की पोटली इत्यादि नामों से हर प्रकार के रोगों के उपचार भी छापे जाने लगे हैं।

इसी प्रकार विभिन्न शारीरिक मानसिक एवं अन्य हर प्रकार की समस्याओं के समाधान सुझाने के स्तम्भ भी अब पत्र-पत्रिकाओं के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आए प्रकार के यह घरेलू टोटके पढऩे वालों का ध्यान ही आकर्षित नहीं करते अपितु अक्सर उन्हें प्रयोग हेतु प्रेरित भी करते हैं।

यह कहना कठिन है कि ऐसे उपचार सुझाने वालों ने स्वयं उन्हें आजमा कर देखा होगा या नहीं। अक्सर ऐसे नुस्खे सुने सुनाए भर ही होते हैं। अत: बताए गए अवयवों (इन्ग्रीडियेंटस) की मात्रा एवं प्रयोग विधि आदि की सही और समुचित जानकारी को त्रुटिहीन अथवा असंदिग्ध कह पाना कठिन ही होता है।

रोग का निदान और उस का सही उपचार एक गंभीर विषय है। चिकित्सक बनने के लिए वर्षों का अध्ययन, प्रशिक्षण तथा अनुभव आवश्यक होता है। जहां सही उपचार रोगी की जान बचाता है वहीं गलत उपचार का परिणाम घातक भी हो सकता है। कहावत है जिस का काम उसी को साजे। अधकचरा ज्ञान कठिनाइयां उत्पन्न कर सकता है।

कई बीमारियों के बाहरी लक्षण काफी मिलते जुलते होते हैं। विशेषज्ञ चिकित्सक भी कई प्रकार के टेस्ट कराने के उपरांत ही किसी निष्कर्ष पर पहुंच पाते हैं। ऐसे में पत्र-पत्रिकाओं में छपे नुस्खों पर भरोसा करके उन्हें प्रयोग में लाना अपनी जान पर खेलने जैसा हो सकता है।

कई बार तो ऐसे टोटकों की प्रयोग विधि इतनी जटिल होती है कि एक आम आदमी के लिए सारी आवश्यक सामग्री जुटा पाना कठिन हो जाता है। अभी मेरे सामने एक टोटका है जिस में कई जड़ी बूटियों को कूटने पीसने छानने पकाने के बाद उसे प्रात: सायं गोमूत्र के साथ सेवन करने का निर्देश है। विशेष बात यह है कि मूत्र काली गाय की दूधपीती बछिया का होना चाहिए और वह भी प्रात: काल का प्रथम बार का मूत्र। अब भला ऐसा मूत्र जुटा पाना क्या आम आदमी के लिए संभव हो सकता है।

हमारा सामान्य भारतीय शिष्टाचार भी इस क्र म में कोई कम योगदान नहीं देता। परिवार में किसी के भी जरा सा अस्वस्थ होते ही पड़ोसी मित्र परिचित संबंधी सबका हाल पूछने के लिए अविलंब तांता सा लग जाता है। विशेषता यह है कि हर आने वाला अपना कोई न कोई नुस्खा टोटका दवादारू बताता ही है और उसे ही आजमाने का भरपूर आग्रह भी करता है।

खेद है कि हमारी दण्डसंहिता में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो पत्र-पत्रिकाओं आदि में सुने सुनाए नुस्खे और टोटके छापने पर प्रतिबंध लगाए या हाल पूछने आने वालों को दवा दारु बताने से रोके किंतु यह आवश्यक है कि हम स्वयं इस नादान दोस्तों के भुलावे में न आ कर अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ का जोखिम न उठाएं।

- ओमप्रकाश बजाज

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