बच्चों की आंखों का भी रखें ध्यान

बच्चों की आंखों का भी रखें ध्यान

आंखें तो सब के जीवन में बड़ी नियामत हैं पर बच्चों को शायद इनकी वैल्यू न पता हो। पैदा होने से बचपन तक की देखभाल तो माता-पिता का फर्ज है। फर्ज के साथ साथ उन्हें उनकी वैल्यू भी समझाएं और उनकी देखभाल भी कैसे करनी है, बताएं। जब बच्चा पैदा होता है तो उसके 15-20 दिन पश्चात् आई स्पेशलिस्ट से उसकी आंखों की जांच करवा लें ताकि जन्म से कोई परेशानी हो तो पकड़ में आ जाए। साढ़े तीन साल की आयु में भी उसकी आंखों की जांच करवा लें। अगर नंबर कमजोर होगी तो प्रारंभ से ही उसे सही नम्बर का चश्मा लगवा दें। कभी कभी आंखों की मांसपेशियां कमजोर होती हैं तब भी डॉक्टर की सलाह लें। व्यायाम, खुराक या दवा प्रारंभ से उस पर ध्यान दें।

आंखों की जांच जरूरी: बच्चे अगर शिकायत करें कि उन्हें ब्लैक बोर्ड पर लिखा आराम से नहीं दिखता या टीचर शिकायत करे कि बच्चा अपना होमवर्क रोजाना पूरा नोट नहीं करता तो माता-पिता को चाहिए एकदम नेत्र विशेषज्ञ से मिलकर आई साइट चैक करवाएं। अगर नजर कमजोर है तो हर छ: मास बाद उसकी जांच करवाते रहें। अगर नजर ठीक है। तो दो साल में एक बार जांच करवाते रहें।

बच्चों की आंखों का बचाव करें ऐसे:-

- नवजात शिशु को विटामिन ए की खुराक अवश्य पिलाएं क्योंकि विटामिन ए की कमी से बच्चों की आंखें प्रभावित होती हैं।

- बच्चों की आंखों में सुरमा, काजल या शहद न डालें।

- बिना समस्या के आंख में कोई दवा न डालें।

- बच्चों को विटामिन ए से भरपूर खाना दें सब्जी, दूध व मौसमी फल आदि।

- कोई भी इंफेक्शन होने पर बच्चे को तैराकी के लिए न भेजें क्योंकि पूल इंफेक्शन जल्दी फैलता है।

- बच्चों को लेटकर पढऩे के लिए निरूत्साहित करें।

- अगर बच्चों को चश्मा लगा है तो सोने से पहले उन्हें समझाएं कि दोनों हाथों से चश्मा उतार कर केस में रखें।

- बच्चों को आंखें न मलने दें।

- हाथ धुलवाकर ही हाथों को आंख पर लगाने की सलाह दें।

- अगर बच्चे थोड़े बड़े हैं और कॉन्टेक्ट लैंस का प्रयोग करते हैं तो उनके रख रखाव पर पूरा ध्यान दें। हाथ धोकर सुखाकर लैंस लगाएं और उतारें।

- थोड़ी भी धूल आंधी से आंखों में परेशानी होने पर साथ हाथों से साफ जल से तीन चार बार आंखें धुलवाएं।

- सुनीता गाबा

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