तलाकशुदा पुरूषों का दर्द

तलाकशुदा पुरूषों का दर्द

हर किसी को अखरता है और टीस देता है रिश्तों का टूट जाना और घरौंदे का बिखर जाना और रिश्ता जब जन्म-जन्म का साथ देने वालों का टूटता है तो दु:ख ज्यादा ही होता है। तलाक की पीड़ा महिला को ही नहीं, पुरूष को भी तोड़ देती है। जहां तलाकशुदा महिलाओं का गम बांटने में कई शरीक होते हैं और हर कोई उनके प्रति हमदर्दी रखता है, वहीं तलाकशुदा पुरूष अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति भी नहीं कर पाते और घुट घुट कर जीने को विवश हो जाते हैं।

तलाक के मामले में पुरूष को ही दोषी करार देने की समाज की मानसिकता और अधिकतर मामलों में पत्नी के साथ ही बच्चों से अलगाव तलाकशुदा पुरूषों की पीड़ा को और बढ़ा देता है। एक ओर कठोर दिल कहे जाने वाले पुरूष अपने दर्द पर रो भी नहीं पाते, वहीं दूसरी ओर तलाकशुदा महिलाओं के टपकते आंसुओं को हर कोई पोंछने की कोशिश करता है।

अपमान का कड़वा घूंट

वैवाहिक गठबंधन में पड़ी गांठ पुरूषों को भी पारिवारिक तिरस्कार ही देती है। ऐसा ही उदाहरण है कि दो साल पहले अपनी पत्नी से अलग हो चुके एक प्राइवेट बैंक के एक्जीक्यूटिव के अनुसार, कभी खुशी और उम्मीदों के साथ बसाए गए आशियाने का टूट जाना सचमुच बहुत तकलीफदेह होता है। एकाएक आपकी सामाजिक अहमियत ही खत्म हो जाती है।

'सबसे ज्यादा तकलीफ तो तब होती है जब एक पुरूष होने के कारण मुझे समाज हो या परिवार, हर जगह संबल देने के बजाय दोषी ठहराने की ही कोशिश की जाती है। अक्सर यह माना जाता है कि ऐसे भावनात्मक ज्वार पुरूषों पर हावी नहीं होते पर हकीकत यह नहीं है। शादी की असफलता उन्हें भी कचोटती है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि समाज और परिवार में मिलने वाले इस तिरस्कार से मैं अंदर तक कांप जाता हूं।

एक चालीस वर्षीय सेल्समैन जो तलाकशुदा है, उनके अनुसार वे जब कभी लोगों के बीच होते हैं तो डरे-डरे और सहमे-सहमे से रहते हैं। वे आशंकित होते हैं कि कोई उनकी दुखती रग पर हाथ न रख दे और उनके वैवाहिक जिन्दगी के बिखराव को कुरेदने न लगे। इसी भय के चलते वे घर से बाहर कम ही निकलते हैं। वे लोगों के बीच जाने से कतराते हैं।

एक समाजशास्त्री के अनुसार हमारा समाज पुरूष प्रधान समाज माना जाता है जिसके चलते किसी रिश्ते के टूटने का कारण चाहे जो भी हो, इसके लिए पुरूष को ही दोषी माना जाता है। जहां तक सामाजिक तिरस्कार की बात है, सामाजिक जिम्मेदारी न रहने से व्यक्ति का पूरा सोशल नेटवर्क ही खत्म हो जाता है। उसे समाज में एक गैर जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में देखा जाने लगता है जो सामाजिक और पारिवारिक तिरस्कार की अहम वजह होती है और यही तिरस्कार उनकी मानसिक वेदना का कारण बनता है।

बच्चों से जुदाई का गम

पत्नी और बच्चों के प्यार से भरे पूरे घर के बिखरने से पुरूष का पूरा व्यक्तित्व ही बिखर जाता है। वह भी तन्हा और टूटा हुआ महसूस करता है, यह कहना है एक सरकारी स्कूल टीचर का जिन्हें अपनी पत्नी और बच्चों से अलग हुए एक लम्बा अरसा बीत गया है। उनके मन में इस बात को लेकर कई बार टीस उठती है कि मैं भी कभी पत्नी और बच्चों के लिए कमाता था। वो मेरे और मैं उनका सहारा था। कई बार तो आत्मविश्वास ही डिग जाता है। अब न आगे बढऩे का मन करता है न ही कुछ पाने का। कभी-कभी तो दिल में यह सवाल भी उठता है कि यह कमाई भी किस के लिए करूं।

दूसरी ओर एक दुकानदार से बात हुई तो पता चला कि उनका गम भी कम नहीं, तलाक के बाद कोर्ट ने फैसला दिया कि उनका पांच वर्षीय बेटा मेरे पास नहीं, 'पत्नी के साथ रहेगा। पिता कहलाने के हक से वंचित हो गया। घर भी काटने को दौड़ता है। अब तो घर आने पर भी कोई पूछने वाला नहीं कि कैसे हो, बहुत इंतजार कराया। इस बात को तो मनोवैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं कि परिवार पुरूष को जिन्दगी में आगे बढऩे की प्रेरणा देता है, उसे अपनी सामाजिक जिम्मेदारी महसूस कराता है। यही अहसास अतत: पूरे समाज को बांधने में सहायक होता है।

नहीं मिलती समाज की सहानुभूति

जिस पुरूष का परिवार टूट जाता है उसके लिए हमारे समाज में सहानुभूति कम ही देखने को मिलती है। अलगाव का कारण चाहे जो भी हो, हर कोई उसे ही इस दर्दनाक परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार मानता है पर शादी जैसे बंधन के टूट जाने का दर्द इस दौर से गुजरने वाला ही समझ सकता है,' यह कहना है फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया में एक सीनियर क्लर्क का।

उनकी सात साल पहले शादी हुई थी। महाशय को पत्नी से अलग हुए दो साल हो गए हैं। उनकी पांच साल की बेटी भी मां के साथ ही रहती है। उनके मुताबिक भावनाओं के दर्द को झेलने और इससे उबरने में पुरूषों को भी मानसिक प्रताडऩा के दौर से गुजरना पड़ता है। 'सच कहूं तो घर टूटने के साथ ही मैं भी टूट गया।

एक एडवोकेट का यह भी कहना है कि परिवार की जरूरत तो पुरूषों को भी होती है। तलाक के मामले में दोनों पक्षों को भावनात्मक पीड़ा तो झेलनी पड़ती है पर कटु वैवाहिक जीवन की बात जब भी होती है, अक्सर पुरूषों का पक्ष छूट ही जाता है जब कि तकलीफ उन्हें भी कम नहीं होती।

हमारे समाज में छवि बनी हुई है कि पुरूष न तो परेशान होते हैं और न ही दुखी? यह सामाजिक सोच उनकी मुश्किलें और बढ़ा देती है। हमारे घर परिवार का माहौल कुछ ऐसा है कि पुरूष अपने हालात के प्रति दुखी नहीं दिख सकते, खास कर शादी टूटने के मामलों में। यह विचार एक लेक्चरर के हैं जो पिछले डेढ़ साल से पत्नी से अलग होने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

-जे.के. शास्त्री

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