जीवन का सच्चा सुख है निरोगी शरीर

जीवन का सच्चा सुख है निरोगी शरीर

शक्तियों में स्वास्थ्य को पहली प्रत्यक्ष शक्ति माना गया है। एक स्वस्थ व्यक्ति हर क्षेत्र में उन्नति को प्राप्त करता है जबकि रोगी का मन, मस्तिष्क, स्वभाव सभी कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है और वह कोई योजना बनाने तथा उसे सफल करने की स्थिति में नहीं रहता। ऐसी जि़दंगी न अपने लिये प्रसन्नता देती है न दूसरों को, इसलिये निरोग रहना जीवन की प्रथम आवश्यकता मानी गई है।

निरोग रहने के लिये क्या-क्या करना चाहिये, अक्सर लोग इस रहस्यमयी विद्या को जानते हुये भी भटकते रहते हैं, बहुमूल्य दवाएं खरीदते हैं और जो भी बनता है, करते हैं। तो भी आरोग्य किसी किसी के हाथ ही लगता है लेकिन निरोग रहने की प्रक्रि या अत्यन्त सरल है। प्रकृति के थोड़े से नियमों का पालन करने से ही इस प्रयोजन की पूर्ति बिना किसी कठिनाई के हो जाती है।

स्वस्थ बने रहने के लिये जिन नियमों का पालन करना पड़ता है वे पांच हैं। इन नियमों का पालन करने से स्वास्थ्य अक्षुण्ण बना रहता है और यदि किसी कारण बिगड़ भी जाये तो प्रकृति क्षमा कर देती है तथा खोया हुआ स्वास्थ्य पुन: लौटा देती है।

निरोग रहने के लिये सबसे पहले आवश्यक है 'सात्विक भोजन।' सात्विक भोजन से तात्पर्य है-भूख से अधिक न खाना। खाने की मात्र इतनी हो कि आधा पेट आहार से भरे, चौथाई पानी सेे और चौथाई हवा के लिये खाली रहे। जायके के फेर में दूना भोजन कभी न करें। आमाशय, आंतें, जिगर से रिसने वाला पाचक रस इतना कम होता है कि वह औसत से आधा ही पचा पाता है।

जो पच सके, वही भोजन है अन्यथा जो बिना पचे पेट में पड़ा रहे, वह तो विष के समान है। भोजन अच्छी तरह चबा-चबा कर किया जाये। जिस प्रकार पेट में पाचक रस निकलता है उसी प्रकार मुंह के स्राव भी महत्त्वपूर्ण हैं। पूरी तरह चबाया हुआ भोजन ही पचेगा वर्ना दांतों का काम आंतों को करना पड़ेगा और अपच पैदा होगा। भुना, तला भोजन न किया जाये। दालों को छिलके के साथ ही ग्रहण करें, आटे में से चोकर अलग न करें वरना वह अपना जीवन तत्व खो देगा।

यदि हम सजीव आहार लें तो निश्चित रूप से वह मेवा मिष्ठानों से अधिक पौष्टिक होगा और हमारा पेट भी खराब नहीं होगा जिससे बीमारी से बचाव की आधी समस्या दूर हो जायेगी।

निरोग रहने का दूसरा नियम है-'उपयुक्त श्रम करना'। अंग अवयवों को पुष्ट रखने के लिये शारीरिक श्रम की नितांत आवश्यकता है। यह व्यवस्था इसलिये है कि भोजन पचता रहे तथा भीतरी व बाहरी अवयवों को उस परिश्रम से मजबूती हासिल होती रहे।

जो लोग मस्तिष्कीय कार्य अधिक करते हैं व शारीरिक श्रम नहीं करते, उनका पाचन तंत्र गड़बड़ा जाता है और हाथ पैरों से लेकर गुर्दोंं, फेफड़ों व जिगर तक में कमजोरी आ जाती है। ऐसी स्थिति में उन्हें व्यायाम करना, तेज चलना, टहलना व मालिश करना आदि क्रि याएं करनी चाहिये ताकि थोड़ा शारीरिक श्रम हो। वयोवृद्ध लोगों को भी कुछ व्यायाम अवश्य करना चाहिये।

निरोगिता का तीसरा नियम है-'पूरी नींद लेना'। मध्यम श्रेणी के व्यक्ति को सात-आठ घंटे की नींद अवश्य लेनी चाहिये। रात को जल्दी सोने व सुबह जल्दी उठने की आदत डालनी चाहिये। जो लोग रात्रि में नींद पूरी नहीं कर पायें, वे दोपहर में सोकर अपनी नींद की पूर्ति अवश्य कर लें।

कई बार अनावश्यक विचार मन में आने पर अनिद्रा की स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसे में विचारों को विचारों से काटना चाहिये। जो विचार मन में आ रहे हों, उनसे भिन्न विचार मन में लाने चाहिए। अनिद्रा की स्थिति दूर करने के लिये शवासन ठीक रहता है। इसमें शरीर के अंग अवयवों को शिथिल छोड़ देना चाहिये। यह कोशिश करनी चाहिये कि सोने का समय जागने में न बीते। शारीरिक व मानसिक थकान दूर करने हेतु नींद ही सर्वोत्तम साधन है।

स्वास्थ्य का चौथा नियम है 'सफाई'। गंदगी के माध्यम से छोटे-छोटे कीटाणु हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और वे अपना विस्तार करके शरीर को अस्वस्थ कर देते हैं। इसलिये पहनने के कपड़े, खाने के बर्तन, पानी, रहने की जगह इत्यादि साफ होनी चाहिये। जिन स्थानों पर धूप का आवागमन नहीं होता, वहां कीटाणु पलते हैं अत: घर को यदा-कदा आग जलाकर गरम कर लेना चाहिये तथा बिस्तर आदि को धूप लगाते रहना चाहिये।

स्वास्थ्य तंत्र का पांचवां आधार है 'विचार तंत्र'। मस्तिष्क पर अनावश्यक विचारों का प्रभाव नहीं पडऩे देना चाहिये। क्र ोध, चिंता, भय, आवेश, निराशा आदि से युक्त जिसका मस्तिष्क होगा, वह कभी स्वस्थ नहीं रह सकेगा। मस्तिष्क शरीर का संचालक है। यह ज्ञान तंतुओं द्वारा समस्त शरीर पर नियंत्रण रखता है। यदि मस्तिष्क उत्तेजित व आवेशग्रस्त होगा तथा अनैतिक विचारों जैसे ईष्र्या, डाह, चोरी, बेईमानी, प्रतिशोध आदि में घिरा रहेगा तो यह प्रक्रि या जीवन में असंतुलन तो पैदा करेगी ही, साथ ही स्वास्थ्य भी बिगाड़ेगी।

कामुक विचारों को भी अपने से दूर रखें। कितने ही लोग वासनात्मक कुकल्पनाएं करते रहते हैं। यह भी एक उत्तेजनात्मक प्रक्रि या है। इससे तनाव बढ़ता है और मानसिक शक्तियों का बुरी तरह हृास होता है।

जिन्हें स्वस्थ रहना है उन्हें हंसते हुये मस्ती भरे दिन गुज़ारने चाहिये। जो इन प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं, उनसे रूग्णता व बीमारी कोसों दूर रहती है। कदाचित् कभी कोई रोग घेर भी ले तो भी प्रकृति उसके स्वास्थ्य को लौटा देती है। जो जीव-जन्तु प्रकृति के संरक्षण में रहते हैं उनमें से कोई बीमार नहीं होता।

मौत व बुढ़ापा तो स्वाभाविक है पर बीमारी अस्वाभाविक है। खुली हवा में प्राकृतिक सांस लेने पर मनुष्य निश्चय ही निरोगी व दीर्घजीवी बना रहेगा तथा उन सभी लक्ष्यों को प्राप्त कर सकेगा जिनके लिये वह पृथ्वी पर आया है।

- अंजलि गंगल

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