कम ही मिलेंगे मानसिक रूप से स्वस्थ लोग

कम ही मिलेंगे मानसिक रूप से स्वस्थ लोग

आज की जीवन शैली, उपभोक्ता संस्कृति के असर में है। सुख सुविधा, ऐशो आराम की ललक, प्रतिस्पर्धाओं से उपजा ईष्र्या मिश्रित तनाव, बुजुर्गों का हाशिए पर होना, आत्मकेंद्रित व्यवहार के चलते अपने में सिमटी खुदगर्जी, महत्त्वाकांक्षाओं का आकाश, एकल परिवारों के कारण बढ़ता एकाकीपन, ये कारण ऐसे हैं जिनकी वजह से मनोरोग बढऩे लगे हैं।

बारीकी से देखें तो मनोरोग के छोटे मोटे लक्षण हर किसी में मिल सकते हैं लेकिन चूंकि हर एक के पास 'विलपावर' भी है, हम उससे स्वयं निपट कर दिमागी संतुलन कायम रखते हैं।

हायपोकोंड्रिया यानी बीमारी का वहम जब हदें पार करने लगे तो मानसिक रोग का लक्षण बन जाता है।

अत्यधिक शक्की होना मन का चैन हर लेता है और आपका और घरवालों का जीना दुश्वार कर देता है। बेवजह लोगों से मनमुटाव होना जीवन में जहर घोल देता है। यह भी मनोरोग का ही लक्षण माना जाऐगा। रॉयल बुलेटिन की नई एप प्ले स्टोर पर आ गयी है।royal bulletin news लिखे और नई app डाउनलोड करें

फोबिया की स्थिति अर्थात बेवजह भयभीत होकर असुरक्षा के अहसास से भर जाना दिमाग की एबनॉर्मल कंडीशन का द्योतक है।

उपर्युक्त बातें कुछ ऐसे लक्षण हैं जो व्यक्ति को मनोरोगी की श्रेणी में ले आते हैं।

इसके अलावा सबसे बड़ी ज्वलंत समस्या जिसकी गिरफ्त में हर छोटा बड़ा गरीब अमीर जकड़ता जा रहा है, वह है मानसिक तनाव जो अगर बहुत समय तक बना रहता है तो दिमाग को मानो उसकी आदत ही पड़ जाती है और उसकी प्रकृति ही जब तनावग्रस्त रहने की बन जाती है तो निश्चय ही यह मनोरोग है जिसका इलाज जरूरी है।

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मानसिक तनाव से जुड़ी स्वभावगत समस्याएं जब पैदा हो जाती हैं तो जिंदगी दुश्वार बन कर रह जाती है। चिड़चिड़े व्यक्ति को भला कौन पसंद करेगा? चिड़चिड़ाहट मानसिक तनाव की देन है। कार्य करने की क्षमता पर भी असर पड़ता है। डिप्रेशन हो सकता है। आत्मविश्वास तो कमजोर पड़ता ही है। भूलने की बीमारी हो जाती है। याददाश्त कम हो जाती है।

कभी अतिरिक्त उत्साहित होकर लगातार बोलना, कभी गुमसुम होकर लंबे समय तक चुप्पी साध लेना भी देखा जा सकता है। तनाव से न जूझ पाने की स्थिति में कई लोग नशे के आदी हो जाते हैं। कई लोग ओवरईटिंग करने लगते हैं जिससे उनका वजऩ बढऩे लगता है या फिर खाने से अरूचि होने की स्थिति में वजन घटने लगता है और कमज़ोरी आ घेरती है।

मनोरोगों की चिकित्सा कुशल मन: चिकित्सक ही कर सकता हैं। इसके लिये एलापैथी में तरह-तरह की दवाएं मौजूद हैं जिन्हें लेकर मरीज भला चंगा हो जाता है और फिर से नॉर्मल जिंदगी जीने लगता है। परिवार वालों का 'सपोर्ट' मरीज के पुनर्वास के लिये अहम् है। केवल डॉक्टरी चिकित्सा ही काफी नहीं होती।

-उषा जैन शीरीं

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