सोच जवान तो बुढ़ापा जवान

सोच जवान तो बुढ़ापा जवान

जिस तरह मृत्यु एक अटल सत्य है उसी प्रकार यह भी ध्रुव सत्य है कि जिसने जन्म लिया है उसकी यदि अस्वाभाविक मृत्यु नहीं होती तो उसे जीवन में चार दौरों से गुजरना है, बचपन, जवानी, प्रौढ़ावस्था और बुढ़ापा। सच तो यह भी है कि बचपन नादानी में, जवानी सुनामी में और प्रौढ़ता कहानी में बीत जाते हैं मगर बुढ़ापा कैसा बीतेगा इसके लिए बड़े से बड़े दिल वाला भी साधारणत: आशंकित रहता है। आशंकित ही नहीं, अक्सर अंतर्मन में भयभीत भी रहता है। अपने आसपास के बूढ़े लोगों के बुढ़ापे की दशा को देख कर अपने बुढ़ापे के प्रति आशंका स्वाभाविक भी है।

जिस तरह से यह सब सच है उसी तरह से यह भी एक बहुत बड़ा सच है कि हम में से अधिकतर लोग उम्र अधिक होने पर अपने शरीर के ढलने या बुढ़ापे में शरीर में होने वाले स्वाभाविक परिवर्तनों से डरते हैं। हमें बुढ़ापे में अपने अशक्त होने से उतना डर नहीं लगता जितना बुढ़ापे में अनाकर्षक होने से लगता है।

अपनी उन स्वाभाविक शक्तियों या विशेषताओं को जिन्हें हमने अपने बचपन से जवानी तक विशेष परिश्रम से परिमार्जित या विकसित किया है उनके खोने या कम होने का डर हमें चैन नहीं लेने देता। यह स्थिति स्वयं हमारे लिए ही सुखद नहीं होती और इस डर के चलते कई बार हम अपने बुढ़ापे को जल्दी आमन्त्रण ही दे लेते हैं। इस डर के चलते हम हर समय आशंकित रहते हैं कि सामने वाला व्यक्ति या हमें देखने वाला व्यक्ति हमें अनाकर्षक तो नहीं समझ रहा। अधिक दिनों तक यह भावना रहने पर यह कुंठा में परिवर्तित हो जाती है और फिर यहीं से शुरू होती है एकाकी जीवन की पहली सीढ़ी।

यह कटु सत्य है कि हममें से कोई भी कितना ही बहादुर बनने की कोशिश करे बूढ़ा या बीमार होना नहीं चाहता लेकिन यह नियति है। सांसारिक जीवन के ये दो पक्ष हैं जो आने हैं तो आने ही हैं। इन्हें आप आने से रोक नहीं सकते किन्तु इन आपदाओं का अगर स्वाभाविक रूप से सामना किया जाए तो इन स्थितियों में होने वाली मुसीबतों को कम से कम किया जा सकता है बल्कि यूं कहें कि इन्हें एक हद तक 'एन्जाय' भी किया जा सकता है।

अक्सर यह माना जाता है कि बुढ़ापे में बीमारी का होना एक स्वाभाविक बात है और इससे ही मृत्यु होती है। यह सोच हमें नैराश्य भाव की ओर ले जाती है और हम बुढ़ापे में मृत्यु को अटल सत्य के रूप में तो स्वीकार करते ही हैं बीमारी को भी अभिन्न प्रसंग मान कर चलते हैं। यह स्थिति बहुत ही खतरनाक है और बीमारियों को स्वयं आमंत्रण देने जैसी है।

हम अपने आसपास देखें तो हमें अनेक लोगों की मौतें बिना बीमारी हुए हो गयी मिलती हैं। अक्सर हम सुनते हैं कि अमुक महोदय अच्छे खासे रात को खाना खाकर सोये थे। खाना खाकर टहलने भी गये थे। रात को सोये तो सुबह नहीं उठे। चेहरे पर कोई पीड़ा का भी भाव नहीं था जो लगे कि कोई बीमारी का अटैक था मगर डाक्टर इस स्थिति में भी हार्ट-फेल्योर बता कर अपनी स्थापित परिकल्पनाओं को सच साबित करने का प्रयास जरुर करेगा। इस स्थिति को अगर हम इस दृष्टिकोण से देखें कि मरना तो तभी होगा जब दिल की धड़कन बंद हो जाएगी और यह एक दिन होनी ही है तो फिर हार्ट-फेल्योर का क्या मतलब, तो यह सोच मृत्यु को एक सुखद मोड़ के रूप में प्रस्तुत कर देगी।

हम मृत्यु को भी एक शारीरिक स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में लेकर उसे 'एन्जाय' कर सकते हैं। अगर हम खोजें तो हमारे आसपास ही अनेक लोग हमें ऐसे मिल जाएंगे तो बुढ़ापे को शान से जी रहे हैं और कभी बीमार नहीं पड़ते। इसलिए इस मिथ्या धारणा को मन से निकाल देना चाहिए कि बुढ़ापे के साथ बीमारियाँ तो आती ही हैं। जिस दिन आप इस सोच से बाहर आ जाएंगे, बीमारियाँ आप के आसपास फटकने से भी डरेंगी बल्कि अच्छा तो यह होगा कि हम बुढ़ापे और बीमारियों के बारे में सोचने के बजाए अपने उन कार्यों के बारे में सोचें जो हम अपनी व्यस्तताओं के कारण नहीं कर पाए हैं। स्वयं को एकाग्र कर हमें इन कामों को एक एक कर करने में अपना समय व्यतीत करना चाहिए।

अगर समाज सेवा करने का आपका मिशन आपके मन में रह गया है तो फिर अपने मिशन से सम्बन्धित कार्य करने वाली किसी संस्था से जुड़ें और उसमें व्यस्त हो जाएं। यह याद रखें कि संस्था में अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास न करें, संस्था में दो प्रकार के लोग होते हैं एक वे जो प्राण पण से काम करते हैं और दूसरे वे जो दिखावा करते हैं किन्तु थोड़े ही दिनों में मन लगाकर काम करने वाले लोग संस्था में अपनी एक विशिष्ट पहचान और जगह बनाने में सक्षम हो जाते हैं।

इस उम्र में हमें दूसरों से कभी यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि वे हमारी देखभाल करें हमें अब अपनी देखभाल स्वयं करनी चाहिए। दूसरे हमें प्यार करें, इसके बजाय हमें अपने स्वयं के ऊपर अपने ध्यान को केन्द्रित करना चाहिए। हमें किस समय किस वस्तु की आवश्यकता होती है हमें वह स्वयं जुटाकर रख लेनी चाहिए। परिवार के किसी अन्य सदस्य के सहारे नहीं रहना चाहिए। हमें यह बात हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि सबकी अपनी अपनी प्राथमिकताएं और व्यस्तताएं होती हैं। हमें कोशिश यह करनी चाहिए कि हम उनकी प्राथमिकताओं में बाधक न बनें। उन्हें उनकी जिन्दगी जीने दें। कभी भूल कर भी यह सोच विकसित न होने दें कि जब यह असहाय था तो हमने इसे पल-पल ध्यान देकर पाला, इस योग्य किया कि आज यह एक अच्छी जिन्दगी जी सके और जब ये एक अच्छी जिन्दगी जी रहा और आज हमें इसकी थोड़ी सी परवाह की जरूरत है तो यह हमें नहीं दे रहा है। यह सोच हमारे पारिवारिक जीवन में तो खटास पैदा करती ही है स्वयं हमारे स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक साबित हो सकती है इसलिए इस सोच को अपने से परे रखें।

आपने कोई अपवाद नहीं किया कि अपने बच्चे को पाला उसे योग्य बनाया। सब अपने बच्चों को अपनी क्षमता के अनुरूप श्रेष्ठ देने की कोशिश करते हैं। आपके पिता ने आपके साथ किया, आपने अपने बच्चे के साथ किया और अब वह अपने बच्चे के साथ कर रहा है। यह तो विधि का विधान है नियति है। ऐसा नहीं कि अपवाद नहीं होते लेकिन अगर हमने अपने माँ-बाप के साथ अपवाद बन कर व्यवहार नहीं किया है तो हमें अपने बच्चों के अपवाद बनने का सपना नहीं पालना चाहिए।

यह जरूरी नहीं है कि हम अपने उम्रदराज होने का दंभ अपने मनमस्तिष्क में लिए फिरें। बात बात पर उसका प्रदर्शन करें और लोगों को बताएं कि हम बहुत अनुभवी हैं। हो सकता है यह परम्परा हमारे बचपन में प्रचलित रही हो और हमारे बुजुर्ग इसका लाभ उठाते रहे हों मगर आज यह सहनीय नहीं है। आज का बच्चा स्वयं को बहुत बुद्धिमान समझने लगा है और जब तक स्वयं उसका दिमाग किसी बात को सही नहीं कह देता तब तक वह किसी बात को मानने को तैयार नहीं होता। आजकल के बच्चे का गुरु, परामर्शदाता और बुजुर्ग उसके हाथ के स्मार्टफोन में उपलब्ध 'गूगल' है। कोई समस्या आने पर वह गूगल सर्च करके कोई न कोई समाधान ढूंढ ही लेता है, इसलिए उम्र के इस दौर पर जब तक बहुत जरूरी न हो या सामने वाला स्वयं आपसे राय न मांगे अपनी राय देने की बुद्धिमानी न करें। हो सकता है आप अपने समय में जिन परिस्थितियों से गुजरे हों वह उससे सर्वथा भिन्न परिस्थिति से गुजर रहा हो। हाँ अगर आपसे राय मांगी जाय तो उन परिस्थितियों का स्पष्ट विवरण देते हुए अपने तत्कालीन निर्णयों और उनके परिणामों से अवश्य अवगत कराएं। आप देखेंगे कि इससे आपके सम्मान में आशातीत अभिवृद्धि होगी।

अब कुछ अपने बारे में विशेष ध्यान रखने वाली बातों पर विमर्श कर लिया जाए। इस उम्र में भी कुछ न कुछ नया सीखते रहें चाहे वह कुछ भी हो। अगर आप लिख सकते हैं और आपका रुझान साहित्य में है तो अवश्य लिखें। अपने स्वास्थ्य के बारे में चिंता अपने डाक्टर को करने दें। कोशिश करें कि नियमित व्यायाम या योग करें। केवल हंसमुख लोगों के सानिध्य में रहें और खूब हंसते रहें। चिड़चिड़े और उदास लोगों के बीच भूल कर भी न जाएं। हर परिस्थिति और हर घटना का सकारात्मक रूप लेकर उसके बारे में सोचिये। परिवार के बच्चों के बीच उनकी रूचि के अनुसार व्यवहार कीजिये हो सके तो बच्चा बन कर मिलिए। जो आपके प्रिय हैं उन्हें तो महसूस कराइए ही, जो नहीं हैं उन्हें भी जताइए कि आप उनसे प्यार करते हैं।

और अंत में भूल कर भी किसी नकारात्मक पक्ष पर न सोचिये। परिणाम आप तो नहीं देख पाएंगे लेकिन और लोग देखेंगे कि आपके परिजन, मित्रजन और आप से एक बार भी मिल चुके लोग आपको एक लम्बे समय तक याद रखेंगे। बात बात पर आपको उदृत करेंगे।

- राज सक्सेना

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