शारीरिक कमी पर फोकस क्यों?

शारीरिक कमी पर फोकस क्यों?

अनुभूति अपने जमाने में बेहद खूबसूरत और टेलेंटेड हुआ करती थी। टेलेंटेड तो वे उम्र के इस पड़ाव पर भी थी लेकिन अब नृत्य और स्पोटर््स उन्हें आर्थराइटिस के कारण छोडऩा पड़ गया था।

उन्हें सदा से हर तरफ से प्रशंसा ही मिलती रही थी। अब शारीरिक कमी के कारण वे अपनी तकलीफ और मुश्किलों से तो बखूबी निपट लेती थी। अगर नहीं सह पाती थी तो वो था लोगों का उनके पैरों को लेकर बेवजह सहानुभूति दिखाते हुए उन्हें जबर्दस्ती बेचारगी का अहसास कराना।

वे अच्छी तरह जानती थी कि किसे उनसे कितनी हमदर्दी थी। हमदर्दी के नाम पर उनका दिली सुकून वे उनके चेहरे पर पढ़ लेती थी। एक सो कॉल्ड फ्रैंड ने तो बड़ी बेशर्मी से कहा कि उसे तो इसमें बड़ा मजा आता है।

उम्रदराज लोगों को तो अक्सर ही शारीरिक कमजोरियों और बुढ़ापे से जुड़ी त्रासदियों को लेकर उपहास का सामना करना पड़ता है। हमारी मानसिकता कुछ ऐसी बन गई है कि सोचते हैं कि बूढ़ों को खुशी और उत्साह से जीने का अधिकार नहीं। वे बुढ़ापे से लड़ते हैं। उनकी लड़ाई में उन्हें सपोर्ट करने के बजाय उन्हें नीचा दिखाने शर्मिंदा करना मानो कई युवाओं का शगल बन जाता है। यहां तक कि कई बूढ़े भी अपने ही हमउम्र लोगों का मजाक बनाने से बाज नहीं आते।

इस तरह की नेगेटिव बातों को अपने मनोरंजन का जरिया बनाने के बजाय यही वक्त और एनर्जी अपने व्यक्तित्व का विकास करने उसे चमकाने में लगाएं या अपनी कोई प्रतिभा, आर्ट, हुनर को आगे बढ़ाने का प्रयत्न करें तो क्या ही अच्छा हो। किसी के मनोबल को तोडऩा, किसी के आत्मविश्वास को कम करने का प्रयत्न करना किसी आतंकवादी हरकत से कम नहीं।

किसी का कुछ अच्छा नहीं कर सकते तो कम से कम बुरा तो न करें। यही सच्चा धर्म है कि खुद भी खुशी से रहो, दूसरे को भी खुश रहने दो। कहा गया है सुख बांटना ही सच्चा और सबसे बड़ा धर्म है। शरीर का सुंंदर, असुंदर होना हमारे अपने वश में नहीं होता। इसी तरह कोई भी शारीरिक कमी होने के लिए इंसान दोषी नहीं होता। इसके लिये उसे प्रताडि़त करना या उसके मन को चोट पहुंचाना उचित नहीं है। ऐसा करके आप अपना ही नैतिक पतन करते हैं।

अगर हममें मानवता है, हम इसका मतलब समझते हैं तो हम अपनी शारीरिक कमी को लेकर दुखी, डिप्रेस्ड, एकाकी व बुझे हुए लोगों को जीवन की मुख्यधारा से जुडऩे के लिए प्रेरित करेंगे। उन्हें हाशिए पर खिसकाने में नहीं जुट जाएंगे। शारीरिक कमी को हाईलाइट करने के बजाय जस्ट इग्नोर करेंगे। यह अहसास न खुद में जगाएंगे, न सामने वाले में जगाएंगे कि वह जरा भी असामान्य हैं।

- उषा जैन शीरीं

Share it
Top