रीढ़ की हड्डी की टी. बी. लाइलाज नहीं

रीढ़ की हड्डी की टी. बी. लाइलाज नहीं

भारत जैसे विकासशील देश में जहां अभी भी कई प्रतिशत आबादी गरीबी की रेखा से नीचे है, टी. बी. (क्षय रोग) जैसी बीमारी का काफी प्रकोप है। आमतौर पर यह रोग फेफड़ों को प्रभावित करता है लेकिन हड्डी तथा जोड़ों की टी. बी. का प्रकोप भी काफी देखा गया है।

टी. बी. से घुटना, टखना, कूल्हा, रीढ़ की हड्डी इत्यादि जैसे जोड़ प्रभावित होते हैं परन्तु रीढ़ की हड्डी की टी. बी. सबसे अधिक प्रभावित करने वाला तथा घातक रोग है। इसे डॉक्टरी भाषा में 'पोट्स स्वाइन' भी कहते हैं।

यह रोग 5 वर्ष के बालक से लेकर प्रौढ़ अवस्था तक के लोगों को प्रभावित करता है। आमतौर पर यह रोग रीढ़ की हड्डियों के बीच की सीने (थोरेसिक) की हड्डियों को अधिक प्रभावित करता है, क्योंकि इन्हीें पर शरीर का अधिकतर तनाव पड़ता है।

सरिता विहार, दिल्ली के आधारशिला गेट स्थित बोन जाइन्ट केयर फाउन्डेशन ऑफ इन्डिया के निदेशक, सीनियर आर्थोपीडिक सर्जन डॉ. सुभाष शल्या के अनुसार यह रोग 'मायोबेक्टेरियम ट्यूबरक्यूले' नामक कीटाणु की वजह से होता है। हड्डी में यह रोग, रोगी के पहले से संक्रमित फेफड़ों से रक्त प्रवाह द्वारा फैलता है। एक रीढ़ की हड्डी के टुकड़े (वरटीब्रा) की रक्तधमनी निचले वरटीब्रा को भी रक्त प्रवाह करती है। इसलिए एक से अधिक वरटीब्रा के प्रभावित होने की संभावना बढ़ जाती है।

वरटीब्रा में संक्रमण होने के बाद लगातार उस पर वजन पडऩे से वरटीब्रा ढह जाता है जिससे संक्रामक चिपचिपा मवाद वाला पदार्थ निकलता है तथा अन्य अंगों को प्रभावित कर सकता है। नसों पर दबाव डालकर संबंधित मांसपेशियों में लकवा मार सकता है जोकि निचली धड़ तथा टांगों की होती है। इस परिस्थिति को 'पोट्स पेराप्लीजिया' भी कहते हैं, या फिर त्वचा या मांसपेशी के नीचे जाकर मवाद का फोड़ा (कोल्ड एबसिस) भी बना सकता है।

डॉ. शल्या बताते हैं कि हड्डी की टी. बी. का रोगी पहले से फेफड़ों की टी. बी. से पीडि़त होता है तथा अचानक ही पीठ में दर्द तथा अकड़ाहट की परेशानी बताता है। रोग बढऩे के साथ-साथ पीठ की आसपास की मांसपेशियों में अकडऩे से भी दर्द बढ़ता है। प्रभावित वरटीब्रा को दबाने पर दर्द बढ़ता है।

इसके अलावा रोगी की पीठ में कोई सूजन (कोल्ड एबसिस) हो सकती है। पीठ के मवाद का जमाव अलावा कोल्ड एबसिस गर्दन में, कूल्हे में या फिर जांघ के ऊपरी हिस्से में हो सकती है। इसके अलावा रोगी को टी. बी. के आम लक्षण जैसे कमजोरी, भूख न लगना, रात को पसीना आना, शाम को बुखार चढऩा महसूस होते हैं। कुछ रोगियों में बरटीब्रा के ढहने से पैरों में लकवा मार जाता है।

इस स्थिति (पोट्स पेराप्लीजिया) में रोगी का मल-मूत्र त्याग करने की प्रणाली पर काबू नहीं रहता। यह काफी परेशानी करता है। रोगी के पैरों की मांसपेशी अकडऩे से उनमें कुरूपता आ जाती है। रोगी की पीठ में कुबड़ापन (काईफोसिस) तथा टेड़ापन (स्कोलियोसिस) आ जाता है। रोगी की सांस लेने की क्षमता में कमी आने से दिल पर जोर बढ़ जाता है तथा दिल का दौरा पडऩे का खतरा रहता है।

डॉ. शल्या के अनुसार रोग की प्रारम्भिक जांच में एक्सरे अनिवार्य है। इससे प्रभावित वरटीब्रा की स्थिति तथा कोल्ड एबसिस के बारे में आसानी से पता चल जाता है। रोग की अधिक सही व स्पष्ट जानकारी के लिए रीढ़ की हड्डी का एम. आर.आई. आवश्यक है। खून की जांच में हीमोग्राम जरुरी है। इसमें ई.एस.आर. बढ़ जाता है। इसके अलावा मान्टूक्स टैस्ट, इम्योनोग्लोबिन तथा बायोप्सी टेस्ट भी जरूरी होते हैं।

इसकी चिकित्सा के विशेषज्ञ डॉ. शल्या (फोन - 98101-24433 )के अनुसार रोगी का इलाज इस बात पर निर्भर है कि रोगी को लकवा है या नहीं। अगर लकवा नहीं है तो इलाज का उद्देश्य रोग को रोकना तथा उसके गंभीर परिणामों को न बढऩे देना होता है। इसके लिए रोगी को ए. टी. टी. दवायें (कीमोथेरेपी) डेढ़ से दो साल तक दी जाती हैं। इस इलाज के दौरान समय समय पर रोगी की जांच कराई जाती है जिससे रोग की स्थिति का पता चलता रहे।

इस दौरान रोगी की रोग निरोधक क्षमता को उच्च प्रोटीन, विटामिन, आयरन, कैल्शियम युक्त भोजन द्वारा बढ़ाया जाता है। रोगी को साफ-सुथरे खुले हवादार कमरे में रखा जाता है। रोगी को पूरा आराम करने दिया जाता है। रोगी को अधिक नुकसान से बचाने के लिए एक जैकेट भी पहनानी पड़ सकती है। रोगी को सांस की कसरतें तथा जोड़ो ंकी चाल व मांसपेशियों की ताकत बनाये रखने के लिए फिजियोथेरेपी करवानी चाहिए।

जिन रोगियों को लकवा हो जाता है उनमें ऊपर दिये इलाज के साथ सर्जरी की जरूरत पड़ती है। सर्जरी, कीमोथेरेपी के तीन माह बाद करानी चाहिये नहीं तो संक्रमण फैल सकता है। इस सर्जरी को 'डीकम्प्रेशन सर्जरी' कहते हैं।

सर्जरी के बाद भी कीमोथेरेपी जारी रखी जाती है। सर्जरी के करीब दो सप्ताह बाद लकवा ठीक होने लगता है। इस वक्त फिजियोथेरेपी से अच्छे परिणाम आते हैं। 6 से 9 महीने बाद रोगी को ब्रेस लगाकर घूमने दिया जाता है तथा धीरे-धीरे रोगी सामान्य जीवन जीने लगता है।

- अशोक गुप्त

सेहत सुधारे सुबह की तेज चाल

सुबह की सैर करने वाले यदि इस समय कुछ देर के लिए ही सही, तेज चाल चलें तो कई गुना अधिक लाभ मिलेगा। सुबह के समय वातावरण में प्राण वायु आक्सीजन की मात्र अधिक रहती है। मुंह बंद कर तेज चाल चलने से यह आक्सीजन सांस के माध्यम से शरीर में जाती है जो रक्त को शुद्ध कर सीधे शरीर के सभी अंग में पहुंच जाती है। इसका लाभ समस्त शरीरांगों को मिलता है।

तेज चाल से रक्त प्रवाह में तेजी आती है। बीपी बढ़ता है जिससे रक्त मार्ग का अवरोध दूर होता है। यह पौरूष ग्रंथि के रोग भी दूर करती है। हार्ट पेशेंट को सर्दी के समय तेज ठंड में सैर करने से बचना चाहिए। सर्दी के मौसम की सुबह हार्ट, शुगर एवं सांस के रोगियों के लिए खतरनाक होती है। इन्हें डाक्टर की सलाह पर ही सर्दी में सुबह सैर के लिए निकलना चाहिए।

शराब से होता है दिमाग का सत्यानाश

नशीले पेय शराब को मदिरा, दारू, सोमरस आदि अनेक नामों से जाना जाता है। मनुष्य के साथ इसका प्राचीन समय से नाता है। विविध नामों से जाना जाने वाला यह नशीला पेय विविध वस्तुओं से बनाया जाता है। यह अनाज एवं फलों आदि से दुनियां भर में बनाया जाता है। पीने वाले पर इसके नशे का प्रभाव एक समान नहीं दिखता। कुछ ढक्कन भर पीकर बहक जाते हैं तो कुछ बोतल भर गटक कर भी होश में रहते हैं।

इस की लत लग जाने पर शरीर इसका आदी हो जाता है और तब इससे मुक्ति पाना कठिन हो जाता है। इसके अधिक सेवन का प्रभाव सभी अंगों पर पड़ता है। मस्तिष्क, पाचन तंत्र लिवर, किडनी, त्वचा आदि सब प्रभावित होते हैं। व्यवहार, बातचीत की शैली, हाव-भाव सब बदल जात हैं। स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती हैं। चीजें अस्पष्ट एवं धुंधली दिखाई देती है। शरीर सुस्त एवं कमजोर हो जाता है। यह निष्कर्ष केलिफोर्निया के एक शोध का है।

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