हानिकारक है सौंदर्य बढ़ाने हेतु कृत्रिम पदार्थों का प्रयोग

हानिकारक है सौंदर्य बढ़ाने हेतु कृत्रिम पदार्थों का प्रयोग

प्रदर्शन व दिखावा आज के युग की संस्कृति बन गई है। इस उपभोक्तावादी संस्कृति के बढऩे, पनपने के कारण दिखावे पर पैसा खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भारतवासियों की इस कमजोरी को समझ लिया कि यहां के लोग बहुधा सांवले होते हैं और वे किसी भी तरह गोरा होना चाहते हैं। सुंदर दिखना तो शायद पूरी मानव जाति की कमजोरी है।

इसी का परिणाम है कि नित्य नई सौंदर्य सामग्रियां बाजार में आ रही हैं जिनमें कई प्रकार की क्रीम, शैम्पू, हेयर डाई, लोशन, आई शेडो, लिपस्टिक, लिपग्लास, नेलपॉलिश, हेयर स्प्रे, हेयर रिमूवर, परफ्यूम आदि और भी न जाने कितनी चीजें हैं। ज्यादातर महिलाओं में सौंदर्य प्रसाधनों को अपनाने की ज्यादा आतुरता है। इस आतुरता, व्याकुलता में वे अपनी त्वचा पर कितना अत्याचार कर रही हैं, इसे वे नहीं जानती। यदि यही स्थिति रही तो एक दिन ऐसा आ जायेगा, जब उनकी त्वचा विद्रोह कर देगी।

कोई भी पदार्थ त्वचा के रंग को नहीं बदल सकता। त्वचा का काला या गोरा होना त्वचा में उपस्थित पिगमेंट मैलानिन के कारण होता है। यह मैलानिन जितनी मात्रा में त्वचा में रहता है, त्वचा का रंग उतना ही गहरा रहता है। किसी भी उपाय से मैलानिन को कम नहीं किया जा सकता। यही हाल झुर्रियों का है। मालिश आदि से झुर्रियां भले ही कम हो जायें पर किसी क्रीम से यह कम नहीं होतीं। हां, कुछ क्रीमें बाजार में ऐसी भी आ रही हैं जो त्वचा की ऊपरी सतह की कोशिकाओं को नष्ट करके हटा देती हैं और उससे अंदर वाली सतह ऊपर आ जाती है। इससे कुछ समय तक गोरा होने या झुर्रियां कम होने का भ्रम रहता है परंतु अंदर वाली सतह में भी मैलानिन उतनी ही मात्रा में रहता है।

तरह-तरह के शैम्पू, खिजाब कंडीशनर आदि के इस्तेमाल ने गंजेपन की रफ्तार को काफी बढ़ाया है। यदि बालों पर ऐसे ही हमले जारी रहे तो 21 वीं सदी के उतार तक अधिकांश मानव जाति गंजी हो जायेगी।

वर्तमान समय में तैयार लिपस्टिक भी 25 प्रतिशत चर्मरोगों के लिये जिम्मेदार है। त्वचा पर लगाये जाने वाले रासायनिक पदार्थ मूत्र के जरिये बाहर निकलते हैं। अत: यह सोचना गलत है कि त्वचा, होंठ, आंख और बालों पर प्रयोग किये जाने वाले रसायन शरीर में प्रवेश नहीं करते हैं।

लिपस्टिक व नेल पॉलिश भी इसलिये खतरनाक हैं कि ये पेट में जाती हैं। नेलपॉलिश में प्रयुक्त रसायन खाना बनाते समय खाद्य पदार्थों में मिल जाते हैं और शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। टाइटेनियम डाइआक्साइड तथा बैनजोइन नामक रसायनों से निर्मित लिपस्टिक होंठों को सजीला अवश्य बनाती है लेकिन इसे अत्यधिक गाढ़ा करने के लिये खरगोश एवं भेड़ की चर्बी मिलाई जाती है। कई बार तो यह चर्बी इतनी बढ़ जाती है कि इससे होंठ काले पड़ जाते हैं व रसायनयुक्त होने से सूजन एवं खुजली भी होने लगती है।

इसी तरह रूज़ में प्रयोग होने वाले वर्जामोट से रोमछिद्र बंद हो जाते हैं, ऊपर से त्वचा को सुन्दर एवं चिकना बनाने वाले पाउडर में भी तारकोल जैसा खतरनाक पदार्थ होता है।

आईब्रो पैंसिल और मस्कारा जैसी सामग्रियों में ग्रेफाइट एवं लेड जैसे पदार्थ होते हैं जिनके प्रयोग से आंखों के बाल झडऩे लगते हैं।

इस निर्मम हिंसा की चादर से लिपटी प्रसाधन सामग्री को लगाकर क्या हम सचमुच मनुष्य कहलाने योग्य हैं?

शरीर को स्वस्थ व सुंदर बनाने के लिये किसी प्रसाधन की आवश्यकता नहीं अपितु उचित खान-पान के द्वारा ही हम अपने को कांतिमय बना सकते हैं।

यदि कुछ लगाना ही चाहें तो कई प्राकृतिक चीजें हैं जो उपयोग में लाई जा सकती हैं जैसे-क्रीम की जगह पर कच्चा दूध या मलाई, माश्चराइजर की जगह शहद, हल्दी भी त्वचा को सुंदर बनाती है। गुलाब जल के नियमित प्रयोग से त्वचा की झुर्रियां कम हो जाती है।

बालों को काला करने के लिये आंवले का प्रयोग करें। मेंहदी लगाने से बालों की चमक बनी रहती है।

तथ्य यही है कि स्वास्थ्य एवं सुंदरता को प्राकृतिक ढंग से बेहतर बनाया जा सकता है। हमारे देश में प्राकृतिक जड़ी- बूटियों का अनोखा भंडार है। यदि इन घरेलू प्राकृतिक नुस्खों को अपनायें तो सौंदर्य में निखार तो आयेगा ही, साथ ही रासायनिक वस्तुओं की हानियों से भी बचा जा सकता है।

-अंजलि गंगल

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