शरीर को रोगी बनाते हैं मनोविकार

शरीर को रोगी बनाते हैं मनोविकार

हमारे शरीर पर केवल खानपान में होने वाली अनियमितता और जीवनचर्या के प्रति हमारी लापरवाही का ही प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि हमारे आचार-विचार भी हमारी काया को बहुत हद तक प्रभावित करते हैं। मनोविकारों की प्रतिक्रिया किसी न किसी रोग के रूप में उभर कर सामने आती है। जो व्यक्ति बहुत जल्दी उत्तेजित, आतुर या क्रोधित हो उठते हैं, उनका रक्त प्रवाह आवश्यकता से अधिक दौडऩे लगता है और हृदयाघात की आशंका तीव्र हो जाती है जो मानसिक तनाव के साथ-साथ ही शरीर में अन्य विकारों को भी जन्म दे डालती है।

यदि हम अपने स्वभाव को बदल कर अनावश्यक उत्तेजना को दूर भगा दें और मन को शान्त, व प्रसन्न रखें, दूसरों की तरह खुश रहें तो ऐसी स्थिति शायद ही आये।

जिनके मन में भय, चिन्ता और आशंका हर समय घर किये रहती है, उनके दिल की गति भी असामान्य हो जाती है। वह अचानक बढ़ जाती है और अचानक ही घट जाती है। अधिकतर लोग इसे दिल की बीमारी समझते हैं। ऐसी स्थिति को टालने के लिये जीवन में अपने भीतर निश्चितता, स्थिरता, धैर्य और खुशमिजाजी को स्थान देकर जीना सीखना चाहिए। यह बात भी भली भांति याद रखनी चाहिए कि सद्विचार ही उत्तम जीवन का निर्माण करते हैं। महापुरुषों के जीवन से हम प्रेरणा ले सकते हैं। ईष्र्या मन का सबसे बड़ा शत्रु है इसलिये जीवन के किसी भी क्षेत्र में इसे स्थान न दें।

आप देखते होंगे कि शरीर से स्वस्थ और मोटे ताजे दिखाई पडऩे वाले लोग भी शरीर की कमजोरी, आंखों के सामने अंधेरा छाना, प्रमेह, बहुमूत्र, गुर्दे आदि रोगों और शारीरिक वेदना के शिकार रहते हैं। वे भी रोगों से मुक्ति पाने के लिये अनेक औषधियों व पौष्टिक रस-रसायनों का सेवन करते हैं।

मनोविकार की स्थिति में केवल पौष्टिक रसायनों और बहुमूल्य औषधियों का सेवन मात्र ही लाभदायक सिद्ध नहीं होता। कामुकता के विचार मन में भरे रहना तथा विषय भोग को जरूरत से ज्यादा बढ़ा लेना, आवेशग्रस्त रहना आदि ऐसे रोगों के प्रमुख कारण हैं। इन्हें दूर करने के लिये संयमशीलता की बहुत जरूरत होती है।

जो मनुष्य ईष्र्यालु स्वभाव के होते हैं तथा दूसरों की उन्नति और प्रगति या काम करने के ढंग को देखकर मीन-मेख निकालते और किलसते रहते हैं, ऐसे व्यक्ति स्वभावत: दूसरों के प्रति कुविचार मन में रखकर मानसिक तनाव बढ़ाते हैं। ऐसे व्यक्तियों का पाचन तंत्र खराब रहता है और वे उदर रोगी बने रहते हैं। दस्त, पेट फूलना, थकान, उदासी जैसे विकार उनमें विशेष रूप से विद्यमान रहते हैं।

कुछ लोग ईश्वर का दिया सब कुछ होने पर भी हाथ के बड़े तंग होते हैं। वे बड़े कृपण या कंजूस होते हैं। आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये भी सदा हाथ सिकोड़़े रहते हैं और धन बटोरने के चक्कर में परेशान रहकर अपनी पाचन शक्ति गंवा बैठते हैं। पाचक चूर्ण, गोली, अरिष्ट और आसव आदि लेने पर भी पेट ठीक नहीं रहता। ऐसे व्यक्तियों को चाहिए कि अपनी आदत और दिनचर्या को सुधारें, तभी इन शिकायतों से छुटकारा पा सकते हैं। धन कमाना कोई बुरी बात नहीं परन्तु सेहत खोकर कमाना बुरा है।

जब मनुष्य के मन में दूसरों के प्रति शत्रुता, ईष्र्या, द्वेष, भय, आशंका तथा बदले की भावना समाई रहती है तो वह उतावला व चिन्तातुर बना रहता है। इसके कारण शरीर में रक्तविकार जन्य रोग पैदा हो जाते हैं। अनिद्रा इसका प्रधान कारण होता है। ऐसे व्यक्तियों को चाहिए कि ऐसी सारी बुराइयों को त्याग कर अपने आप में निर्भयता, साहस और हिम्मत बटोरने की आदत डालें। इससे रोग स्वत: ही शान्त हो जायेगा।

किसी-किसी में यह आदत होती है कि वह जरा-जरा सी बात पर बदला लेना, नीचा दिखाना, हंसी उड़ाना, व्यंग्य कसना या षडयंत्र रचना शुरू कर देता है। ऐसी हरकतें और योजनाएं बनाने वाला भयानक सिरदर्द और दूसरी बीमारियों का शिकार बन जाता है। इसलिये ऐसे लोगों को चाहिए कि अपने मन को हमेशा हल्का फुल्का रखने का प्रयत्न करें। मन से बैर की भावना को निकाल फेंके और हंसते हंसाते रहें तो अनेक बीमारियों से स्वत: ही पिंड छूट जायेगा।

स्वस्थ जीवन और रोग मुक्ति की एक महत्त्वपूर्ण कुंजी है कि मनको सदा हल्का रखा जाये। दूसरों के प्रति मन में प्रेम रखें। मुस्कुराने और प्रसन्न रहने की आदत डालने से जीवन सुखी हो जाता है।

-परशुराम संबल

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