बच्चों का लाइलाज रोग है मस्कुलर डिस्ट्राफी

बच्चों का लाइलाज रोग है मस्कुलर डिस्ट्राफी

मस्कुलर डिस्ट्राफी अर्थात् मांसपेशियों का क्षरण या क्षय एक ऐसा रोग या रोगों का समूह है जिसमें मांसपेशियों में अचानक निर्बलता एवं कृशता दोनों ही प्रारम्भ हो जाती हैं। यह एक ऐसी बीमारी है जिसका उपचार अभी तक नहीं ढूंढा जा सका है। यह एक ऐसा रोग है जो रोगी को धीरे-धीरे अपना ग्रास बनाते हुए पल-पल मृत्यु के नजदीक ले जाता है। इस बीमारी में सर्वप्रथम मांस पेशियां अकडऩे लगती हैं और बाद में धीरे धीरे सख्त होकर उग्र स्थिति में पत्थर की तरह हो जाती है। पैरों की पिण्डलियों में अकडऩ एवं सख्ती के कारण रोगी खड़ा होने में अपने को असमर्थ पाता है। धीरे धीरे चलना - फिरना तक दूभर हो जाता है। एक समय ऐसा आता है जब रोगी को बैठना भी मुश्किल होने लगता है क्योंकि मांसपेशियां निष्क्रिय हो जाती हैं। वास्तव में मस्कुलर डिस्ट्राफी एक लाइलाज आनुवंशिक रोग है। यह रोग शैशवावस्था में धीरे-धीरे बढ़ता है। इस रोग से ग्रस्त बच्चे चार साल तक स्वस्थ बच्चों की ही तरह रहते हैं किन्तु बाद में धीरे-धीरे शरीर के विभिन्न अंगों की मांसपेशियां नष्ट, क्षय तथा कमजोर होने लगती हैं। इस बीमारी में सर्वप्रथम नितम्ब तथा कमर की मांसपेशियां कमजोर, क्षीण तथा निष्क्रिय होती हैं। उसके बाद पिण्डलियों की मांसपेशियां इससे ग्रसित होती हैं। इसके बाद कन्धे तथा बाहुमूल एवं भुजाओं की मांसपेशियां सख्त एवं कठोर होकर अकड़ जाती हैं। उनकी निष्क्रियता बढऩे से बैठने, उठने एवं चलने में कठिनाई होने लगती है। कुछ ही दिनों में फेफड़े तथा दिल की मांसपेशियां शिथिल एवं निष्क्रिय होने लगती हैं। मांसपेशियों के क्षतिग्रस्त होने से डायफ्राम की पेशीय क्रियाशीलता कम होने लगती हैं तथा फेफड़ों की क्रियाशीलता दुष्प्रभावित होती है। कार्बन डाईऑक्साइड एवं कफ का जमाव बढ़ जाता है और फेफड़े शीघ्र ही संक्रमित होने लगते हैं। पेट एवं आंत की मांसपेशियों की बनावट गोलाकर होने से कम दुष्प्रभावित होती हैं। मस्कुलर डिस्ट्राफी को मायोपैथी भी कहा जाता है। यह जब पैतृक होता है तो इस स्थिति में पैर तथा हाथों की मांसपेशियों की सक्रियता तथा शक्ति समाप्त हो जाती है। वे लुंजपुंज होकर अपनी सामथ्र्य खोकर रोगी को अपाहिज बना डालती है। भारत में ड्यूशन मस्कुलर डिस्ट्राफी के रोगी अधिक पाये जाते हैं। शरीर की हड्डियों तथा मांसपेशियों में कैल्शियम, मैग्नीशियम तथा फॉस्फोरस का अनुपात गड़बड़ हो जाता है। उनमें धातुओं की कमी के कारण हड्डियों में दर्द रहने लगता है और वे कमजोर हो जाती हैं। इससे ढांचागत विकृतियां आ जाती हैं। मांसपेशियों की कमजोरी का घातक प्रभाव ह्नदय की मांसपेशियों पर भी होता है जो मौत का कारण बन जाता है। इस रोग के दौरान न्यूमोनिया, टाइफाइड इत्यादि संक्रामक रोग होने पर बीस साल के पूर्व ही रोगी की मृत्यु हो सकती है।

- आनंद कुमार अनंत

Share it
Share it
Share it
Top