बाल कथा: आहार का प्रभाव

बाल कथा: आहार का प्रभाव

रमाशंकर जी एक व्यापारी थे। उनका दालों का व्यापार था। वे शांत स्वभाव, दानी, दयालु, धार्मिक और ईमानदार प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, इसलिये ग्राहकों में उनकी साख थी। व्यापार में अच्छी आमदनी थी। खुशहाल परिवार था। घर में सुंदर सुशील पत्नी और पांच वर्ष की एक नन्ही प्यारी-सी बच्ची थी। वह सारा दिन आंगन में खिलौनों से खेलती चहकती रहती थी।

रमाशंकर जी के यहां एक संत रोज भिक्षा प्राप्त करने के लिये आते थे। रमाशंकर जी की पत्नी संत को भिक्षा में रोज एक कटोरा चावल देती थी। काफी समय से यह क्रम चला आ रहा था।

एक दिन संत रमाशंकर की पत्नी से भिक्षा प्राप्त करके चलने लगे तो अचानक उनकी दृष्टि आंगन में खेलती हुई बच्ची पर पड़ गई। बच्ची के गले में सुंदर सी सोने की चेन चमचमा रही थी। यों तो संत में संतों जैसे ही गुण थे। उनका अधिक समय प्रभु चिन्तन में व्यतीत होता था। मोह-माया और छल कपट तो उनसे कोसों दूर था लेकिन उस दिन बच्ची के गले में सोने की चेन देखकर जाने क्यों उनकी नीयत में खोट आ गया। उन्होंने इधर उधर देखकर चुपचाप बच्ची के गले से चेन निकाल ली और झोले में डालकर कुटिया की ओर चल दिये।

उन्होंने बच्ची के गले से चेन निकाल तो ली किन्तु उनका संत मन अशांत हो गया। उन्होंने भिक्षा में प्राप्त चावल पकाये-खाये किंतु किसी मानसिक वेदना के कारण रात भर सो नहीं पाये। उनका मन उन्हें धिक्कारता रहा।

सवेरे संत उठे, नित्य कर्मो को निपटाया। शौच जाने के बाद उनकी बुद्धि ठिकाने आई। उन्हें अपने किये पर पश्चाताप होने लगा। बच्ची के गले से सोने की चेन चुराकर उन्होंने गृहस्थ के साथ विश्वासघात तो किया ही, साथ ही संत रूप में अपना आदर सम्मान भी गवां दिया। एक संत को इस सांसारिक वस्तु से भला क्या काम था?

संत ने सोने की चेन को झोली में डाला और रमाशंकर के भवन की ओर चल पड़े।

द्वार पर आकर संत ने रमाशंकर और उनकी पत्नी को बुलाया। पति पत्नी ने आकर संत के चरण छुये। संत ने मुरझाये स्वर में पत्नी से कहा-पुत्री, कल मुझसे एक अपराध हो गया। ईश्वर भक्ति रूप में मेरे जीवन भर की कमाई एक क्षण में मिट्टी में मिल गई।

पति पत्नी ने आश्चर्य से पूछा-क्यों बाबा ऐसा क्या हुआ जिसके कारण आप इतने दुखी हैं? क्या हमसे कोई भूल हो गई?

संत ने पूछा-कल तुमने मुझे भिक्षा में जो चावल दिये थे, वह कहां से लाये थे?

पत्नी ने बताया-बाबा, चावलों की एक बोरी मैंने एक अनजान व्यक्ति से खरीदी थी। उसने चावल आधे भाव में बेचे थे। वह चावल कहीं से चुराकर लाया था। मैंने चावल सस्ते में खरीद लिये थे।

संत ने कहा-पु़त्री, यही तो कारण था कि मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई। चोरी के चावलों ने मुझे चोरी के लिये प्रेरित किया और मैंने यह दुष्कर्म कर डाला। मैने तुम्हारी बच्ची के गले से सोने की जंजीर चुरा ली। शौच के समय जब अन्न मल बनकर शरीर से दूर हुआ तो मेरी मति लौटी। मुझे अपने किये पर बड़ा पछतावा हुआ। सोचो, जब एक कटोरा चावल खाकर मुझ जैसे विरक्त की बुद्धि भ्रष्ट हो सकती है, तब यह चावल खाकर तुम लोगों की क्या स्थिति होगी? मेरी बात मानो पुत्री, इन चावलों को फेंक दो।

रमांशकर जी की पत्नी को संत की बात सुनकर बड़ा आश्चर्य और दुख हुआ। चोरी के चावलों के प्रभाव से यदि एक संत की ऐसी दशा हो सकती है तो हमारा क्या होगा, सोचकर वह भयभीत हो उठी। उसने सारे चावल फेंक दिये और भविष्य में ऐसा न करने की सौगन्ध खाई।

संत ने बच्ची की चेन बच्ची के गले में पहना दी।

भिक्षा लेकर जाते हुए उन्होंने कहा-यह सदैव याद रखना कि नैतिक और उचित साधनों से प्राप्त किया गया धन और अन्न हमेशा अच्छे विचारों को जन्म देता है। अनुचित और अनैतिक ढंग से कमाया धन और अन्न सद्बुद्धि को उलट देता है।

- परशुराम संबल

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