एक ओर आप, दूसरी ओर मौत

एक ओर आप, दूसरी ओर मौत

जॉर्ज बर्नाडे शॉ का कथन है कि सिगरेट के एक तरफ आग होती है, दूसरी तरफ मूर्ख। निस्संदेह इस कथन की सत्यता को हम कई-कई बार प्रमाणित होते देखते हैं। फिर भी सिगरेट पीने वाले सिगरेट पीना नहीं छोड़ते। कभी छोडऩे का मन बनाया भी तो थोड़े दिनों तक अपने इरादे पर कायम रहते हैं और फिर पूर्ववत सिगरेट पीना शुरू कर देते हैं।
सवाल यह पैदा होता है कि आखिर सिगरेट पीने से मिलता क्या है? क्या सिगरेट कोई ताजगी देती है? क्या सिगरेट पीने से पेट भरता है? बस कुल जमा में यह कि सिगरेट जलाओ, धुआं फेफड़ों श्वास के द्वारा अंदर खींचो और फिर श्वास के द्वारा मुंह और नाक के रास्ते बाहर फेंको। दरअसल सिगरेट एक आदत है जो लग जाती है तो पीछा नहीं छोड़ती।
सिगरेट पीना व्यक्ति शुरू कैसे करता है, यह भी विचारणीय बात है। अमूमन बच्चे बड़ों की देखा देखी जिज्ञासा में इसे अपनाते हैं। दूसरे, सोहबत की वजह से भी सिगरेट की लत लगती है। विद्यार्थी जीवन में भी कई युवक सिगरेट के संपर्क में आते हैं। इसके अलावा सोसायटी मैंटेन करने की मानसिकता तो व्यक्ति को इतनी तेजी से धूम्रपान की ओर आकर्षित करती है कि युवक तो ठीक, युवतियां तक सिगरेट पीना शुरू कर देती हैं।
जैसा कि सर्वविदित है कि छोटा-बड़ा पर्दा अपना असर छोड़ता ही है। खास कर किशोर और युवावर्ग पर तो ज्यादा ही है कि पर्दे पर कौन सा हीरो कैसे सिगरेट थामता है? उंगलियों के बीच सिगरेट को कैसे नचाता है? सिगरेट उछाल कर होंठों के बीच कैसे कैच करता है और सिगरेट के धुएं के छल्ले कैसे बनाता है? ये सारी बातें हर पीढ़ी के किशोरों और युवकों में आम रही हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि सिनेमा के परदे पर सिगरेट पीता नायक युवकों को अपने ही अंदाज में सिगरेट पीने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरित करता है।
अंतिम बात यह है कि सिगरेट के भव्य विज्ञापन जो सिगरेट को महिमामंडित करते हैं। इस महिमामंडन के बीच बारीक अक्षरों में छपी वह चेतावनी कि सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह खो जाती है। विज्ञापन देखने वाला तो यह देखता है कि फलां सिगरेट का अनोखा अंदाज है, अनोखा स्वाद है और उसमें गजब की ताजगी है जिसके कारण पुरूष मॉडल जब सिगरेट पी रहा होता है तो अल्पवस्त्र सुदर्शना उसे मोहक चितवन से फिदा होने अंदाज में ताक रही होती है।
वहीं सिगरेट की ही बहन है बीड़ी। यह निम्नवर्ग की पहली पसंद है। हाल ही में यह बात सामने आई है, बीड़ी-सिगरेट की तुलना में ज्यादा नुकसान करती है। वैसे बीड़ी का धुआं सिगरेट की तुलना में ज्यादा तीखा होता है। सबसे अहम बात यह है कि धूम्रपान जितना नुकसान बीड़ी-सिगरेट पीने वालों को करता है उससे ज्यादा नुकसान उन लोगों को करता है जो आसपास बैठे होते हैं तथा धूम्रपान नहीं कर रहे होते हैं।
धूम्रपान की श्रेणी में ही आता है गांजा, जो चिलम या हुक्के के माध्यम से पिया जाता है। बहरहाल, धूम्रपान वाले लगातार यह कोशिश करते हैं कि नशे को ज्यादा तीखा, ज्यादा उत्तेेजक कैसे बनाया जाए। इसके लिए वे नीला थोथा, धतूरा, चरस आदि जैसे खतरे तक सिगरेट और चिलम में भरते हैं जो उनके जीवन को खतरे में डाल देता है।
यह तय है कि धूम्रपान ने संभावनाओं के जाने कितने जहाजों को डूबो दिया है। जाने कितने महत्त्वाकांक्षी युवक-युवतियां सिगरेट के धुएं में अपने भविष्य को बर्बाद कर देते हैं। लिहाजा इनके विरोध में कहीं से भी उठी किसी आवाज का समर्थन करना चाहिए और धुएं में खो चुके युवक युवतियों को मौत के साम्राज्य से बाहर आने का संकल्प करना चाहिए।
- जे. के. शास्त्री

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