असाध्य बीमारियों की जड़-फ्री रेडिकल्स

असाध्य बीमारियों की जड़-फ्री रेडिकल्स

आजकल प्रमुख असाध्य और जानलेवा रोगों में जिनका नाम आता है वे हैं हृदय रोग, स्ट्रोक, केटारेक्ट, पार्किंसन्स रोग और कैंसर इत्यादि। इन रोगों का सबसे प्रमुख कारण है शरीर में ज्यादा मात्र में फ्री रेडिकल्स का बनना। ये फ्री-रेडिकल्स क्या हैं? आइये, फ्री रेडिकल्स के बारे में कुछ समझने का प्रयास करें- फ्री-रेडिकल्स ऐसे असंतृप्त अणु हैं जो हमारे शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं और उन्हें कमजोर बनाते हैं। ऑक्सीजन के वे अणु जिनका एक इलेक्ट्रॉन खो गया हो, असंतृप्त होकर फ्री रेडिकल्स बनाते हैं। असंतृप्त अणु स्थिर नहीं रह सकते, इसलिए अपने आप को संतृप्त करने के लिए ये हमारे अणु से एक इलेक्ट्रॉन चुराते हैं और जैसे ही ये दूसरे अणु से एक इलेक्ट्रॉन चुराते हैं, दूसरा अणु असंतृप्त हो जाता है और इस प्रकार एक रासायनिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है। यह प्रक्रिया शरीर की कोशिकाओं को हानि पहुंचाती है। अगर इस प्रक्रिया में डी. एन. ए. के अणु शामिल हो जाएं तो म्यूटेशन एवं कैंसर होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। हम फ्री रेडिकल्स को बनने से नहीं रोक सकते। हमारे शरीर में एक रासायनिक प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है जिसे ऑक्सीडेशन कहा जाता है। इसमें ऑक्सीजन की सहभागिता रहती है और फ्री रेडिकल्स इससे सह-उत्पाद के रूप में निरंतर बनता रहता है। फ्री रेडिकल्स ज्यादा बनने का प्रमुख कारण हमारा परिवेश, वातावरण और हमारा खान-पान है। वायु-प्रदूषण, अल्ट्रा वायलेट किरणें, ओजोन, मरकरी और शीशे जैसे तत्व जिसे हम अपने वातावरण से ग्रहण करते हैं, फ्री रेडिकल्स उत्पन्न करने वाले प्रमुख स्रोत हैं। इसके अतिरिक्त उद्योगों से रेडिएशन, मेडिकल एक्स-रे, वाहनों से निकलने वाला धुुआं, वसा की अधिकता वाले खाद्य (जंक-फूड) और रेशा रहित खाद्य पदार्थ भी फ्री रेडिकल्स की संख्या बहुत बढ़ा देते हैं।

समाधान:- फ्री रेडिकल्स को नियंत्रित करते हैं एन्टीऑक्सीडेन्ट्स। इनमें एक अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन होता है जो यह दे सकता है। जैसे ही एन्टीऑक्सीडेन्टस फ्री रेडिकल्स के संपर्क में आते हैं, ये अपना एक अणु देकर फ्री रेडिकल्स को संतृप्त कर देते हैं। ग्लूटाथीओन जैसे कुछ एन्टीआक्सीडेन्ट्स तो शरीर में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध होते हैं। इसके अतिरिक्त जो सबसे महत्त्वपूर्ण एन्टीऑक्सीडेन्ट्स हैं, वे हमें विटामिन 'सी' और विटामिन 'ई' के रूप में भोजन द्वारा बाह्य वातावरण से लेने पड़ते हैं। आज के विषाक्त वातावरण के कारण शरीर में फ्री रेडिकल्स बहुत अधिक बनने लगे हैं जिसे संतृप्त करना ग्लूटाथीओन के बूते के बाहर है, फलस्वरूप असाध्य व्याधियों का प्रकोप बहुत बढ़ता जा रहा है। भयानक रूप लेती इन व्याधियों से बचने के लिए पर्याप्त मात्र में विटामिन 'सी' और विटामिन 'ई' की निरंतर खुराक लेना अति आवश्यक है। ताजे फल और सब्जियां विटामिन 'सी' एवं विटामिन 'ई' के अच्छे स्रोत हैं, इसलिए इनका ज्यादा से ज्यादा भोजन में शामिल होना बहुत जरूरी हैं। आजकल की भागदौड़ की जिंदगी में जहां खाने-पीने का कोई टाइम-टेबल नहीं होता, इन फलों सब्जियों का निरंतर सेवन प्राय: असंभव हो गया है। जंक-फूड और फास्ट फूड के सेवन का प्रचलन इतना अधिक बढ़ रहा है कि शरीर की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं हो पा रही है। परिणामस्वरूप सिरदर्द, थकान, स्टेऊस आदि आम होते जा रहे हैं। अव्यवस्थित खान-पान और विषाक्त वातावरण जिससे बचना प्राय: असंभव हो गया है, को ध्यान में रखकर कुछ वैज्ञानिक और संस्थाएं फूड-सप्लीमेंट्स पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। आज फूड-सप्लीमेंट्स के रूप में न केवल विटामिन 'सी' व विटामिन 'ई' बल्कि शरीर की कोशिकाओं को चुस्त दुरूस्त बनाने वाले सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व प्रोटीन और एमिनोएसिड्स आदि भी उपलब्ध हैं। जरूरत है इनकी उपयोगिता को समझने की और इन्हें अपनाने की ।

यह ध्यान रखें कि:-

- हम फ्री रेडिकल्स को बनने से नहीं रोक सकते।

- सबसे महत्त्वपूर्ण एन्टीऑक्सीडेन्ट विटामिन 'सी' और विटामिन 'ई' शरीर में तैयार नहीं किये जा सकते।

- हमारा शरीर एक सीमा के बाद एन्टीऑक्सीडेन्ट्स नहीं बना सकता।

- साधारण भोजन द्वारा एन्टीऑक्सीडेन्टस् की पर्याप्त मात्र लेना प्राय: असंभव है।

- पंकज कुमार 'पंकज'

Share it
Top