तेज़ एंटी-बायोटिक दवाएं माइक्रोफ्लोरा बिगाड़ती हैं

तेज़ एंटी-बायोटिक दवाएं माइक्रोफ्लोरा बिगाड़ती हैं

आजकल हर बीमारी का इलाज एंटीबायोटिक दवाओं के शक्तिशाली कैप्सूल से होता है जबकि हर तेज दवा का आफ्टर इफेक्ट जरूर होता है। एंटी बायोटिक दवाएं सूक्ष्म जीवाणुओं द्वारा बनाई जाती हैं। यह बैक्टीरिया को तो मार डालती हैं परन्तु रोगी के शरीर को क्षति नहीं पहुंचाती। बहुत सी बीमारियां बैक्टीरिया द्वारा फैलती हैं जिनका सफल इलाज एंटीबायोटिक दवाएं हैं।

कुछ देर बाद ये बैक्टीरिया इन एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति उदासीन हो जाते हैं अर्थात दवा का रोगाणु पर असर नहीं होता। इसे ड्रग-रजिस्टेंस कहते हैं। परिणामत: ज्यादा तेज दवा खानी पड़ती है। टी बी के 2० प्रतिशत से ज्यादा रोगियों पर एंटी बायोटिक दवाओं का असर होता ही नहीं है।

पैंसिलीन, स्ट्रेप्टोमाइसिन, कलोरोमाइसीन, क्लोरोकुनीन प्रचलित दवाएं हैं। ज्यादा एंटी बायोटिक दवाओं से डायरिया या दस्त लग जाने का खतरा रहता है।

हमारी आंतों में लाभदायक बैक्टीरिया रहते हैं। वे हमारे लिए विटामिन बी. और के. बनाते हैं। वे भी प्रभावित होकर आंतों का माइक्रोफ्लोरा नष्ट कर देते हैं दवाओं के कारण।! सामान्य होने के लिए दवाओं का सेवन कुछ देर के लिए छोडऩा पड़ता है। बिना डॉक्टर की सहायता और सलाह किए स्वयं दवा लेने के कारण दुष्परिणाम भोगने पड़ सकते हैं।

- कोई भी एंटीबायोटिक ट्रीटमेंट का कोर्स अधूरा मत छोड़ें। उसका कोर्स पूरा करके ही दवा छोड़ें।

- ज्यादा तेज एंटीबायोटिक मत खाएं अन्यथा अगली बार शरीर की रजिस्टेंस बढ़ जाएगी, तेज़तर दवा खानी पड़ेगी जिसका कुपरिणाम शरीर को भोगना पड़ता है।

- वायरस की बीमारियों जैसे जुकाम इन्फ्लुएंजा के लिए एंटी बायोटिक दवाएं न खाएं। जुकाम वायरल होता है। हर बार अलग किस्म के वायरस से जुकाम होता है।

- यदि दवा प्रभाव न डाले या खराब लगे तो इसका सेवन बंद कर दें।

- बिजेन्द्र कोहली गुरदासपुरी

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