युवा नेतृत्व ही है रालोद के लिए संजीवनी बूटी...युवाओं को जयन्त में नजर आती है चौ. चरण सिंह की छवि

युवा नेतृत्व ही है रालोद के लिए संजीवनी बूटी...युवाओं को जयन्त में नजर आती है चौ. चरण सिंह की छवि

मुजफ्फरनगर (सत्येन्द्र सिंह उज्जवल)। कभी राष्ट्रीय लोकदल के गढ़ के रूप में प्रसिद्ध बागपत रूपी किला चौधरी अजित सिंह के हाथ से निकल चुका है। साथ ही रालोद का अस्तित्व भी मझधर में नजर आ रहा है। रालोद के खोये हुए वजूद व अपने अस्तित्व को तलाश रहे रालोद के मुखिया अब स्थान परिवर्तन की राह पर चल निकले हैं, लेकिन उनके लिए यह राह इतनी आसान नहीं होगी, जितनी कि वह समझ रहे हैं। रालोद सुप्रीमो में अब वह दमखम नहीं रहा, जो कि पार्टी को उसका खोया हुआ वजूद हासिल करा सके। इसके लिए उनके द्वारा अपनी सोच व नेतृत्व परिवर्तन करना ही होगा। जिस प्रकार से भाजपा ने युवा शक्ति को पहचाना तथा उसका प्रयोग कर वह कंेद्र की सत्ता पर काबिज हुई है। यदि रालोद मुखिया को पार्टी के खोये हुए अस्तित्व को तलाशना है, तो उन्हें हर हाल में अपने नेतृत्व को संन्यास देकर युवा नेतृत्व को आगे करके पार्टी संरक्षक की भूमिका निभानी होगी, तब कहीं जाकर पार्टी को अपने खोये हुए अस्तित्व को पाने में कामयाबी मिल पाएगी। केवल भाजपा पर निशाने लगाकर 2013 के जख्मों को हरा कर भला नहीं होने वाला है, क्योंकि उनके लाव-लश्कर रूपी तरकस में वह तीर भी हैं, जिनके द्वारा 2013 में कई सीनों को भेदा गया था।
एक वह जमाना भी था कि जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद की तूती बोलती थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान नेता के दम पर पहचान चौधरी चरण सिंह के द्वारा बनायी गयी थी। जिसके चलते वह प्रदेश के मुख्यमंत्री सहित देश के प्रधानमंत्री तक बने थे। उनके द्वारा दी गयी राजनीति की विरासत रूपी फसल को उनके पुत्रा चौधरी अजित सिंह के द्वारा काफी समय से काटा गया। जिसके चलते वह कंेद्रीय मंत्री तक बने। समय परिवर्तन हो चुका है। रालोद मुखिया को परिवर्तन की कीमत अपने राजनीति के गढ़ बागपत सीट पर दो बार पराजित होने चुकानी भी पड़ी है। चौधरी अजित सिंह अपनी रणभूमि बदल कर जनपद से किस्मत आजमाने को जो दांव खेल रहे हैं और इसके लिए उनके द्वारा जो 2013 के दंगों का जिक्र करने वाली गुगली फेंकी गयी है। उसमें उन्हें कामयाबी मिलना मुश्किल है। भले ही उनके द्वारा आयोजित प्रेस वार्ता में जनपद से चुनाव लड़ने की बात को गोलमोल कर दिया गया हो, लेकिन उनकी यह दो दिवसीय हलचल इसी ओर इशारा कर रही है। उनकी यह राह जितनी वह समझ रहे हैं, उतनी नहीं होगी, क्योंकि उनके द्वारा अपनी सेना में वह सैनिक भी भर्ती कराये गये हैं, जो कि 2013 के दंगों के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से कर्णधार रहे हैं। उनके द्वारा नेतृत्व परिवर्तन करना ही पार्टी के लिए संजीवनी साबित होगा। भले ही इसका असर 2019 में कम हो, लेकिन होगा अवश्य ही।
रालोद के मुखिया अजित सिंह ने जब मीडिया के सामने ये कहा कि वह अब बूढ़े हो गये हैं। ऐसे में उनसे पार्टी का नेतृत्व युवा हाथों जयंत चौधरी को सौंपने के लिए सवाल किया गया, तो वह सीधे जवाब देने के बजाये जनपद से चुनाव लड़ने के सवाल ही कि भांति उसे भी बातों ही बातों में टालते ही नजर आये, लेकिन इशारांे में यह बताना कि वर्तमान में पार्टी की कमान जयंत के ही हाथ में है। इससे काम चलने वाला नहीं है, उनके द्वारा खुले मंच से जयंत को आगे लाकर खुद को पीछे हटना ही होगा, तभी रालोद पुनर्जीवित होगा। युवा नेतृत्व भी पार्टी के लिए संजीवनी बूटी साबित होगा।

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