आंकड़ों की बाजीगिरी में उलझी जनता व पार्टियां

आंकड़ों की बाजीगिरी में उलझी जनता व पार्टियां

मुजफ्फरनगर। स्थानीय निकाय चुनाव सर पर आ गये हैं। नामांकन प्रक्रिया का बिगुल भी बज चुका है, जिसके चलते कल (आज) से प्रारंभ होने वालेी नामांकन प्रक्रिया के तहत नामांकन पत्रा खरीदे व भरे जाएंगे। वहीं दूसरी ओर अभी तक किसी भी छोटे राजनीतिक दल सहित बड़े दल द्वारा अपने अध्यक्ष सहित सदस्य पद के प्रत्याशी की घोषणा दोनों नगर पालिका सहित आठों नगर पंचायतों के लिए नहीं की गयी। जिसके चलते जनता में भी असमंजय की स्थिति बनी हुई है। सभी अनुमान रूपी आंकड़ों की बाजीगिरी आजमा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी में स्थिति टिकट को लेकर एक अनार सौ बीमार वाली साबित हो रही है। वहीं सपा भाजपा की पिछलग्गू बनी हुई है। बसपा के लिए बारह बीघे में दाना नहीं वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। कांग्र्रेस में सीमित प्रत्याशी चुनावी समर में हैं, कांग्रेस पुरानी घोड़े पर ही दांव खेलने की कोशिश में भी जीजान से लगी है। वहीं दूसरी ओर रालोद ने भी अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। वह दूध का जला छाछ को भी पफूंक कर पीता है की कहावत पर चल रही है।
निकाय चुनाव नजदीक आने के कारण भारतीय जनता पार्टी में नगर पालिका व नगर पंचायतों के टिकटों को लेकर घमासान तेज हो गया है। भाजपा के टिकट वितरण में संघ पदाधिकारियों का अहम् योगदान रहता है। संघ के कई कार्यकर्ता भी इस लाइन में लगे हुए हैं।
टिकट के लिए दावेदारी पेश कर रहे कई नेता पिछले कई दिनों से लखनऊ व दिल्ली तक अपना डेरा डाले हुए हैं। खुद की खूबियां बताने के साथ-साथ विरोधियों की कमजोरियों को भी भाजपा हाईकमान के सामने उजागर किया जा रहा है। खासकर अध्यक्ष पद के टिकट के दावेदारों में खींचतान भी शुरू हो गई है। पार्टी नेतृत्व के निर्देश पर दावेदारों की कुंडली तैयार की गयी है। अब यह देखना है कि भाजपा का यह प्रत्याशियों के नामों की घोषणा का उफंट किस करवट बैठता है।
स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी की बात की जाए, तो यह कहा जाएगा कि वह पूरी तरह से भाजपा की रणनीति पर आधारित है अर्थात वह भाजपा की नीति अपनाने की प्रतीक्षा कर रही है। उसी के हिसाब से वह अपने प्रत्याशी की घोषणा करेगी। इस बात को पार्टी के बड़े नेता स्वीकार भी कर चुके हैं। भाजपा के बाद सपा में नगर से सबसे अधिक चेयरमैन पद के प्रत्याशियों द्वारा आवेदन किया गया है। वहीं यदि बात बहुजन समाज पार्टी की की जाए, तो यह कहा जा सकता है कि उसके खेत में बारह बीघे में दाना नहीं है। सूत्रांे का कहना था कि पार्टी को खोजे से भी चेयरमैन पद के लिए ठोस प्रत्याशी नहीं मिल पा रहे हैं। इसके साथ ही सदस्य पद के लिए भी आने वाले आवेदनों का एक प्रकार से टोटा सा पड़ा हुआ है। इस बारे में बसपा के जिलाध्यक्ष मीडिया से एक ्रप्रकार से किनारा सा किये हुए हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बसपा अपनी लोकसभा व विधानसभा में खोयी हुए जमीं स्थानीय निकाय चुनाव में तलाश पाएगी, यह असंभव सा प्रतीत हो रहा है।
यदि कांग्रेस की बात की जाए, तो वह अपनी कच्छुआ वाली नीति पर कायम है। हालांकि अध्यक्ष/चेयरमैन पद के लिए उसके पास कम ही प्रत्याशी हैं, लेकिन वह मजबूत हैं। हालांकि कांग्रेस के पुराने खिलाड़ी अपने पुराने महारथी के परिवार से ही टिकट की जमकर अंदर खाने वकालत कर रहे हैं, यदि वह इसमें कामयाब हो पाते हैं, तो यह चुनाव दिलचस्प हो जाएगा। वहीं राष्ट्रीय लोकदल के द्वारा साईलंेट वाली नीति अपनायी जा रही है। उसकी खामोशी एक बड़े राजनीतिक तूपफान की ओर इशारा कर रही है। जिस प्रत्याशी को लेकर पार्टी के अंदरखाने से आवाज उठ रही है, यदि वह चुनावी समर में आता है, तो यह बड़ी पाटियों के प्रत्याशियों के लिए भारी होगा। जिसके बाद मुकाबला त्रिकोणीय होगा। जिसमें रालोद, भाजपा व कांग्रेस शामिल होंगी।

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