शिया सोगवारों ने निकाले मातमी जुलूस

शिया सोगवारों ने निकाले मातमी जुलूस

मुजफ्फरनगर। रविवार को जनपद भर में गमगीन माहौल में मुहर्रम मनाया गया। हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की करबला में शहादत की याद में शिया सोगवारों ने मातमी जुलूस निकाले और नदी पार करबला में जाकर ताजियों को सुपुर्दे खाकर मातमपुर्सी की। इस दौरान शहर में भारी सुरक्षा बंदोबस्त रहे। हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में मुहर्रम मनाया जाता है। यह कोई त्योहार नहीं बल्कि मातम का दिन है। इमाम हुसैन अल्लाह के रसूल व पैगंबर- ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद के नाती थे। यह मुस्लिम कैलंेडर हिजरी संवत् का प्रथम महीना है। मुहर्रम एक महीना है, जिसमें शिया मुस्लिम दस दिन तक इमाम हुसैन की याद में शोक मनाते हैं। इस्लाम की तारीख में पूरी दुनिया के मुसलमानों का प्रमुख नेता यानी खलीपफा चुनने का रिवाज रहा है। ऐसे में पैगंबर मोहम्मद के बाद चार खलीफा चुने गए। लोग आपस में तय करके किसी योग्य व्यक्ति को प्रशासन, सुरक्षा इत्यादि के लिए खलीपफा चुनते थे। जिन लोगों ने हजरत अली को अपना इमाम और खलीफा चुना, वे शियाने अली यानी शिया कहलाते हैं। रोजा-ए-आशुरा के दिन हजरत इमाम हुसैन की याद में शिया सोगवार मातमी जुलूस व ताजिये निकालते हैं। हजरत मोहम्मद साहब की वफात (मौत) के लगभग 50 वर्ष बाद मक्का से दूर करबला के गवर्नर यजीद ने खुद को खलीपफा घोषित कर दिया। यजीद इस्लाम का शहंशाह बनाना चाहता था। इसके लिए उसने आवाम में खौपफ पफैलाना शुरू कर दिया। लोगों को गुलाम बनाने के लिए वह उन पर अत्याचार करने लगा। यजीद पूरे अरब पर कब्जा करना चाहता था, लेकिन उसके सामने हजरत इमाम हुसैन और उनके कुछ साथियों ने अपने घुटने नहीं टेके और जमकर मुकाबला किया। अपने बीवी-बच्चों की सलामती के लिए इमाम हुसैन मदीना से इराक की तरपफ जा रहे थे, तभी रास्ते में यजीद ने उन पर हमला कर दिया। इमाम हुसैन और उनके साथियों ने मिलकर यजीद की पफौज से डटकर सामना किया। हुसैन के साथ लगभग 72 लोग थे और यजीद के पास 8000 से अध्कि सैनिक थे, लेकिन पिफर भी उन लोगों ने यजीद की पफौज के दांत खट्टे कर दिये थे। हालांकि वे इस युद्ध में जीत नहीं सके और सभी शहीद हो गए। किसी तरह हुसैन इस लड़ाई में बच गए। यह लड़ाई मुहर्रम 2 से 6 तक चली। आखिरी दिन हुसैन ने अपने साथियों को कब्र में दफन किया। मुहर्रम के दसवें दिन जब हुसैन नमाज अदा कर रहे थे, तब यजीद ने धेखे से उन्हें भी मरवा दिया। उस दिन से मुहर्रम को इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत के रूप में मनाया जाता है।
रविवार को सवेरे काली नदी के पास रोजा-ए-आशुरा की नमाज अदा करने के बाद शिया सोगवारों ने इमामबारगाहों में पहुंचकर मातमपुर्सी की, पिफर शहर के इमाम बारगाह आरफी, मल्हुपूरा, बकरा मार्किट, किदवईनगर, प्रेमपुरी से मातमी जुलूस निकाले गये। सभी जुलूस हनुमान चौक पर पहुंचकर बड़े विशाल जुलूस में तब्दील हो गये। यहां शिया सोगवारों ने घंटों तक दिल लरेज खूनी मातम किया। इसके बाद काली नदी पार जाकर करबला में ताजिये सुपुर्दे खाक कर दिये गये। ताजियांेे के रूट को लेकर शहर में सुरक्षा बंदोबस्त सख्त रहे।

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