रेलवे के बेबस सिस्टम के सामने हार गई जिन्दगियां

रेलवे के बेबस सिस्टम के सामने हार गई जिन्दगियां

मुजफ्फरनगर। खतौली में हुए दर्दनाक हादसे के बाद यहां प्रशासन, पुलिस एवं रेलवे विभाग के अलावा उच्चस्तरीय अधिकारियों का आगमन हो रहा है, वहीं आम नागरिक की जुबान पर एक ही सवाल है कि रेलवे के लचर एवं बेबस सिस्टम के सामने आखिर आम आदमी की जिन्दगी क्या इसी तरह हारती रहेगी? उच्च स्तरीय अधिकारी एवं प्रदेश सरकार के मुखिया कह रहे है कि जांच में दोषी पाये गये लोगों को सजा दी जायेगी, लेकिन अहम सवाल यह है कि टूटी रेल पटरी पर 105 किलोमीटर की रफ्तार कलिंग उत्कल एक्सप्रेस को निकालने की अनुमति रेलवे की तरफ से चालक को किसने दी?
रेल दुर्घटना में दो दर्जन से अधिक लोग काल का ग्रास बन गये तथा सैंकडों की संख्या में लोग घायल और अपंग हो गये है। जब रेलवे लाईन पर मरम्मत कार्य चल रहा था, तो वहां संकेतक क्यों नहीं लगाया गया? संकेतन का न होना ही दुर्घटना का कारण बना। अब लोगों के पास रेलवे को कोसने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। मौत के मुंह में गये लोगों एवं घायलों को मुआवजा राशि दिये जाने से उनके परिजनों के जख्म नहीं भर पायेंगे। इस दुर्घटना में ऐसे अनेक लोग शामिल है, जिनकी अभी तक पहचान नहीं हो पायी है। उनके परिजन तो उनके हरिद्वार तीर्थयात्रा पर जाने की आस लगाकर उनके लौटने की उम्मीद लगाकर बैठे है। खतौली का यह ट्रेक काफी समय से बहुत ही जर्जर हालत में था। पटरी का करीब 15 मीटर का टुकडा अलग कटा पडा है। हादसे के बाद एक कोच के नीचे छैनी, हथोडा, चाबी व कटर आदि पडे देखे गये हैं। मरम्मत कार्य में लगे मजदूर एवं वहां देखरेख के लिये मौजूद रेलवे जूनियर इंजीनियर हादसे के बाद से गायब है। इस टूटे ट्रेक पर नया गाटर लगाया जाना था। जोड को बदलने के लिये ट्रेक में छेद भी हो चुका था। दूसरा छेद होना बाकी था, तभी कलिंग उत्कल एक्सप्रेस ट्रेक पर तेज गति से पहुंच गयी और दुर्घटना का शिकार हो गयी। अब सवाल यह है कि जब ट्रेक टूटा पडा था, तो इसकी सूचना रेलवे के उच्चाधिकारियों समेत मेरठ व मुजफ्फरनगर को क्यों नहीं दी गई? खतौली में ट्रेन का स्टोपेज भी नहीं है और यहां ट्रेक ठीक न होते हुए भी ट्रेन को आगे जाने के लिये हरी झंडी दिखाकर हजारों जिन्दगी दांव पर लगा दी गई, जो अक्षम्य लापरवाही है। दुर्घटनास्थल पर कोच ए-1 के नीचे ट्रेक टूटा पडा मिला। लोहे के ग्लैप्स भी उखडे मिले। सबसे बडा सवाल यह है कि टूटे ट्रेक के कारण ट्रेन को कॉशन क्यों नहीं दिया गया। इससे पूर्व मुजफ्फरनगर से मेरठ की तरफ जाने वाली दो ट्रेनों को 20 किलोमीटर की रफ्रतार से गुजारा गया। खतौली के स्थानीय रेलवे अधिकारी शनिवार को ट्रेक पर मरम्मत कार्य न होने की बात कर रहे है, जबकि स्थानीय लोगों का कहना है कि शनिवार को ट्रेक पर मरम्मत कार्य चल रहा था। हादसे की जानकारी होने पर विभिन्न प्रदेशों से लोग मुजफ्फरनगर पहुंच रहे है और सिसक-सिसककर रेलवे सिस्टम को कोस रहे हैं। रेल हादसे में शिकार अनेक लोग गंगास्नान के लिये हरिद्वार जा रहे थे, लेकिन अन्तिम समय में उन्हें गंगाजल के बजाय मौत मिली। ट्रेन में अधिकतर यात्री उडीसा एवं मध्यप्रदेश से थे। अनेक साधु-संत भी इस हादसे का शिकार हुए है। रेलवे के अलावा प्रदेश सरकार ने राहत कार्य चलाते हुए मुआवजे की घोषणा भी कर दी, लेकिन लोगों का कहना है कि रेलवे की लापरवाही ने जान बूझकर यात्रियों को मौत के मुंह में धकेल दिया और इस हादसे को बुलावा दिया। लोगों का कहना है कि यदि रेलवे सिस्टम की कार्यप्रणाली में सुधार नहीं हुआ, तो भविष्य में कोई भी अप्रिय घटना हो सकती है, जिससे रेलवे विभाग अपना दामन बचा नहीं पायेगा।

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