लापरवाही ने तोड़ दी सांसों की डोर?...बिना अनुमति ट्रैक पर किया जा रहा था कार्य

लापरवाही ने तोड़ दी सांसों की डोर?...बिना अनुमति ट्रैक पर किया जा रहा था कार्य

मुजफ्फरनगर। एक छोटी सी लापरवाही एक ओर जहां एक बड़े हादसे का सबब बन गयी। वहीं दूसरी ओर इसने दो दर्जन से अधिक जिंदगियों को मौत के मुंह में धकेल दिया। साथ ही एक सौ से अधिक को जिंदगी व मौत के बीच संघर्ष करने को बाध्य कर दिया। इस लापरवाही की भंेट किसी का भाई, पिता-माता, भतीजा, बहन आदि चढ़ गये। जिसकी भरपाई कर पानी नामुमकिन है। चाहे कितने भी मुआवजे का ऐलान कर दिया जाए, हादसे से मिले जख्म नहीं भरने वाले। खतौली उत्कल हादसे का मुख्य सूत्रधार रेल पथ विभाग को रेलवे की ओर से क्या सजा दी जाएगी, यह एक यक्ष प्रश्न है। 11 जून 2017 की एक घटना, जो कि इसी प्रकार के हादसे को जन्म देती, जिसे एक स्कूली सपफाई कर्मचारी ने होने से रोक दिया था, से भी न तो रेलवे ने और न ही रेल पथ विभाग ने कोई सबक लिया। जिसकी परिणति यह उत्कल का हादसा है। उस व्यक्ति ने अपनी पत्नी की लाल साड़ी के द्वारा आती हुई एक एक्सप्रेस ट्रेन को रोका था। रेल की पटरी को काटकर जोड़ना और वह भी बिना किसी अनुमति के, वास्तव में रेलवे के पीडब्ल्यूआई विभाग के द्वारा रिस्की कार्य किया गया, जिसकी कीमती दो दर्जन से अधिक को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। यह वास्तव में एक जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है। जो एक प्रकार से अक्षम्य है। यह कार्य उस समय किया गया, जब दो घंटे के समय अंतराल में लगभग एक दर्जन के करीब ट्रेनें खतौली से गुजरती हैं, जिसमें अधिकतर एक्सप्रेस हैं।
रेलवे विभाग की एक छोटी से लापरवाही ने दो दर्जन से अधिक लोगों की सांसों की डोर तोड़ कर रख दी। शनिवार को शाम के पांच बजकर 47 मिनट पर पुरी से बनकर हरिद्वार को जाने वाली उत्कल एक्सप्रेस हादसे का शिकार को बेपटरी हो गयी। जिसमें सौ से अधिक लोग घायल हुए तथा दो दर्जन से अधिक मौत के शिकार हो गये। हादसे के समय हादसे के कारण को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे थे। प्रत्यक्षदर्शियों के द्वारा हादसे की वजह वहां पर कार्य कर रहे कर्मचारियों की लापरवाही को बताया गया था। रेल पथ कर्मचारियों की लापरवाही तो प्रथम दृष्टया उस समय नजर आ गयी थी, जब मौके पर से लोगों के द्वारा चाबी, पाने, हथौडा आदि बरामद किया गया था।
रविवार को इस पर बाकायदा मुहर भी लग गयी। रेलवे सूत्रों के अनुसार रेलवे ट्रैक की देखभाल की जिम्मेदारी विभाग के पीडब्ल्यूआई (रेल पथ विभाग) की होती है। यदि रेलवे ट्रैक पर किसी प्रकार का कार्य किया जाता है, तो इसके लिए बाकायदा अनुमति ली जाती है। इसके लिए पीडब्ल्यूआई के द्वारा संबंधित स्टेशन अधीक्षक को लिखित में देना होता है, जो कि उसे उपर कंट्रोल रूम पर देता है, जिसके बाद अनुमति मिलने पर ट्रैक पर कार्य किया जाता है। इसमें लिखा जाता है कि कम गति से ट्रेनों का संचालन किया जाना है या ट्रैक ब्लॉक किया जाना है। कार्य करते समय मौके पर लाइन के दोनों ओर लाल झंडी को लगाना होता है। यदि ट्रैक ब्लॉक करके कार्य किया जाना है, तो अनुमति मिलने पर ट्रेक का ब्लॉक करके कार्य किया जाता है। कार्य समाप्ति के बाद ही संबंधित अधिकारी से स्टेशन अधीक्षक को जानकारी देते हैं, जो कि उसे कंट्रोल रूम को देता है। जिसके बाद ट्रेन का परिचालन किया जाता है। टपरी से लेकर सकौती के ट्रैक की जिम्मेदारी पीडब्ल्यूआई के चीफ रेल पथ निरीक्षक (सीपीडब्ल्यूआई) आईजी सिंह की है। इसमें खतौली क्षेत्रा की जिम्मेदारी पीडब्ल्यूआई दीपक कुमार की है। सूत्रों का कहना था कि इस विभाग के खतौती के अधिकारियों ने शनिवार को बिना अनुमति लिये ही ट्रैक पर कार्य किया। जिसकी कीमत लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। इस बारे में जब खतौली के स्टेशन अधीक्षक राजेंद्र सिंह से पूछा गया, तो उनका कहना था कि इस बारे में पीडब्ल्यूआई के द्वारा उनके पास किसी प्रकार की न तौ मौखिक जानकारी दी गयी, न ही लिखित में किसी प्रकार की जानकारी दी गयी। ट्रैक पर कार्य करने को लेकर और वह भी 15 फिट का टुकडा जोड़ने के विषय में स्टेशन अधीक्षक को जानकारी न देता और कार्य करना वास्तव में बड़ी लापरवाही ही कही जाएगी। घटनास्थल पर कार्य करते समय संबंधित अधिकारी द्वारा एक ओर न तो अनुमति ली गयी, इसके साथ ही एक ओर बड़ी गलती यह की कि कार्य करते समय दोनों ओर लाइन के लाल झंडी भी नहीं लगायी गयी। इस बारे में एक गेटमैन ने बताया कि लाइन पर कार्य करते समय कर्मचारियों व अधिकारियों के द्वारा घोर लापरवाही बरती गयी। बिना अनुमति के कार्य किया गया। उक्त लोगों के द्वारा 15 फिट का टुकड़ा तो काट दिया गया, लेकिन समय पर उसे जोड़ा नहीं गया, उसी समय ट्रेन आयी ओैर एक बड़े हादसे का शिकार हो गयी। कर्मचारियों ने काम को सही प्रकार से नहीं किया। उसका कहना था कि कर्मचारी ट्रैक पर सही प्रकार से कार्य नहीं करते हैं, वह खुले पड़े क्लिप आदि को भी सही नहीं करते, केवल खानापूर्ति करके अपनी तनख्वाह सीधी करते हैं। सूत्रों का कहना था कि साढ़े चार बजे से लेकर सात बजे तक लगभग एक दर्जन के करीब ट्रेनें गुजरती हैं और वह भी अधिकतर एक्सप्रेस हैं लंबी दूरी की। इस व्यस्त समय मेें लाइन की पटरी जोड़ने का कार्य किया जाना और वह भी बिना अनुमति के वास्तव में घोर लापरवाही की ओर इशारा करता है। यदि कर्मचारियों व अधिकारियों के द्वारा ट्रैक ब्लॉक की अनुमति लेकर कार्य किया जाता, तो यह हादसा न हुआ होता।

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