महाभारत में अर्जुन के अभिनय ने हमेशा के लिये बना दिया फिरोज को अर्जुन

महाभारत में अर्जुन के अभिनय ने हमेशा के लिये बना दिया फिरोज को अर्जुन

भोपा (रजनीश शर्मा)। जिगर, मेहंदी, तिरंगा, करण अर्जुन, राजा की आयेगी बारात आदि हिट फिल्मों में अभिनय करने वाले पिफरोज खान अर्जुन ने अपने स्वास्थ्य उपचार के दौरान भोपा के वेलनेश हैल्थ केयर पर सोमवार की देर शाम पत्राकारों से वार्ता करते हुए बताया कि 1984 में आई फिल्म मंजिल-मंजिल से अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत की थी। उस समय कुछ फिल्में कुछ खास नहीं चल पाई। इसलिये वह दुबई जाकर नौेकरी करने लगे। किस्मत के उलटफेर से वह अपने वतन लौट आये। कुछ समय बाद उनकी मुलाकात गुफी पेंटल से हुई। उस वक्त गुफी पेंटल के द्वारा बीआर चोपड़ा के द्वारा बनाये जा रहे टीवी सीरियल महाभारत के लिये बेहतर रोल के लिये अर्जुन की जोर शोर से तलाश चल रही थी। हजारों ओडिशन में लेने के बाद भी बीआर चोपड़ा को अर्जुन नहीं मिला। एक दिन गुफी पेंटल उन्हें (फिरोज खान) को अर्जुन की पोशाक पहनाकर चोपड़ा के सामने ले गये और उस दिन महाभारत को सुटेबैल अर्जुन मिला। दर्शकों ने भी फिरोज खान को अर्जुन की भूमिका का ऐसा स्वीकारा कि फिरोज खान तभी से हमेशा के लिये अर्जुन हो गये।तब से आज तक फिरोज की अम्मी भी अर्जुन कहकर पुकारने लगी। महाभारत की सफलता के बाद शुरू हुआ जिगर, मेहंदी जैसी जबरदस्त फिल्मों का दौर। अर्जुन फिरोज खान ने कई दर्जन फिल्मों में खलनायक की भूमिका निभाई है। जिसमें इन्हें अपार सफलता मिली है। बातचीत के दौरान फिरोज ने बताया कि अल्प आयु में कक्षा 7 में एक बुक स्टोर से 40 पैसे एक छोटा सा फोटो खरीदा था, तब उन्हें नहीं पता था कि वह फोटो वासुदेव कृष्ण का है। आज तक इस फोटो को फिरोज अधिक समय अपने साथ रखते हैं। अर्जुन के बाद अब वह रावण का रोल की इच्छा रखते हैं। जिगर फिल्म में दुर्योध्न के रोल का श्रेय वह धर्मेंद्र को देते हैं। अपना चुनौती पूर्ण अभिनय मेहंदी फिल्म में किये गये किन्नर के रोल को मानते हैं। बातचीत के दौरान डा. विजय सैनी, पूर्णिमा, शिक्षा देवी, सोमपाल, अंकित, सुनील, पियंक व अंकित आदि मौजूद रहे। नहीं था हिंदी भाषा का ज्ञान: फिरोज खान को उस समय हिंदी भाषा का ज्ञान नहीं था। बहुत कम ज्ञान होने के बावजूद वह अपनी मंजिल की ओर आगे बढते गये और एक दिन सरस्वती मां की कृपा से अर्जुन के अभिनय के रोल के साथ ही अच्छी हिंदी बोलने लगे। वह अगले माह व एक बार फिर भोपा व तीर्थ नगरी शुकतीर्थ में आने की बात कह कर गये।

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