सोलह श्रंगार कर सजना के लिए सजी सजनी... सुहागिनों ने रखा पति की दीर्घायु का व्रत, कहानी सुन व चांद का अवलोकन कर खोला करवाचौथ का व्रत

मुजफ्रपफरनगर। भारतीय संस्कृति के अनुसार भगवान में श्रद्धा व आस्था के साथ महिलाओं ने अपने पति की दीर्घायु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा है और चन्द्र दर्शन के उपरांत पति दर्शन कर व्रत को खोला। आधुनिकता के दौर में भी भारतीय नारी अपनी संस्कृति व सभ्यता नहीं भूली है। आज भगवान में आस्था व श्रद्धा के साथ पति की लम्बी आयु के लिए महिलाओं ने करवा चौथ का व्रत रखा। दोपहर तक निर्जला रह कर अपने बुजुर्ग महिलाओं के साथ व्रत की कथा सुनकर जल ग्रहण किया और चन्द्र दर्शन के साथ पति के दर्शन कर अपनी बुजुर्गों से आशीर्वाद लेकर अपने व्रत को पूर्ण कर अपनी परम्परा को निभाया। इस परम्परा में नई पीढ़ी भी अपनी पत्नियों को सहयोग करते मिले। पत्नियों को खरीदारी कराने व सजने संवरने में सहयोग करते पति बाजार में नजर आये। इस संबंध में पतियों का कहना था कि जब हमारी पत्नि हमारे लम्बे जीवन की इच्छा लेकर व्रत रख सकती है, तो हमारा भी नैतिक दायित्व बनता है कि हम भी हमारी शुभेच्छू पत्नी की लम्बी उम्र की कामना करें और उसकी पूर्ति हेतु ईश्वर से प्रार्थना करने के लिए व्रत रखे। आज महिलाओं का करवाचौथ का व्रत था। प्रात: को महिलाओं के द्वारा स्नान कर व्रत को रखा गया और दोपहर में करवा चौथ की कथा को सुना गया। उसके बाद बायना निकाला गया। 'करि के हम हूं अब सोलह श्रंगार, पिया को रीझाने चली। एक भोजपुरी फिल्म का यह गीत हमारी भारतीय संस्कृति में सोलह श्रंगार के महत्व को दर्शाता है। आदिकाल से स्त्रिायां अपने पति के लंबी उम्र की कामना के साथ लिए इस व्रत का विधान करती हैं। शास्त्रों की मानें, तो पति परमेश्वर है। यही कारण है कि करवाचौथ के दिन महिलायें ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए कठिन व्रत करती हैं और पति को रीझाने के लिए सोलह श्रंगार को महत्व देती हैं। करवा चौथ के व्रत को करके एक ओर जहां पति-पत्नी के प्रेम में और नजदीकियां आती हैं, वहीं दूसरी ओर परम्पराओं को भी निभाया जाता है। करवाचौथ के व्रत पर महिलाएं सिंदूर, मांग टीका, बिंदी, नथ, काजल, हार, कर्ण-पफूल, मेहंदी, चूडिय़ां, बाजूबंध, मुंदरियां, हेयर असैसरीज, कमरबंद, पायल, इत्र और दुल्हन का जोड़ा यह सोलह श्रंगार करती हैं। इन 16 चीजों से सजने पर ही औरत का श्रंगार पूर्ण होता है, जिससे उसकी सुंदरता में चार-चांद लगते हैं। जब लिपिस्टिक नहीं थी, तब होंठों की लाली के लिए पान का प्रयोग किया जाता था। मां गौरी की पूजा इस दिन विशेष महत्व रखती है। यंू तो गौरी पूजन के अनेक मन्त्रा हैं, लेकिन उत्तर भारत का आम जनमानस जय जय जय गिरिराज किशोरी। महेश मुख चंद्र चकोरी। महा मन्त्र का सहारा लेता है। सोलह श्रंगार जहां एक तरपफ नारी के सौंदर्य को बढ़ाता है, वही दूसरी तरफ स्वास्थ्य अनुकल प्रभाव डालता है। माना जाता है कि सोलह श्रंगार करने से पति-पत्नी के प्यार में भी निरंतर बढ़ोतरी होती है। समय के बदलाव के साथ रोजाना चाहे सोलह श्रंगार करने का समय न मिल पाए, लेकिन करवा चौथ के पावन दिन पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखकर गौरी मां की पूजा करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य आसानी से मिल जाता है। मांग में सिंदूर लगवाना स्त्री के विवाहित होने का सूचक है। एक चुटकी भर सिंदूर से दो लोग जन्मों-जन्मों के साथी बन जाते हैं। शरीर विज्ञान के अनुसार सिंदूर में पारे जैसी धातु अधिक होने की वजह से चेहरे पर झुर्रियां नहीं पड़तीं और महिलाओं में मौजूद विद्युतीय उत्तेजना नियंत्रित होती है।भौहों के बीच में आज्ञाचक्र होता है। बिंदी लगाए जाने वाले स्थान पर ईश्वरीय ऊर्जा के रूप में दिमाग को ऊर्जा प्रदान करते हैं। झील सी आंखें बहुत चंचल और शरारती होती हैं। काजल स्त्री को अशुभ नजरों से बचाता है और सुंदरता को चार-चांद लगा देता है। स्त्री की आंखों को विभिन्न गीतकार ने झील सी आंखें, मछली और मृगनयनी की संज्ञा भी दी है। कंगन दुल्हनों का श्रृंगार और चूडिय़ां लड़कियों का श्रृंगार माना जाता है। स्त्री के बालों में लगा गजरा उसकी स्फूर्ति और ताजगी का प्रतीक माना जाता है। मंगलसूत्र में प्राय: काले रंग के मोतियों के लड़ी में लाकेट या मोर की उपस्थिति जरूरी मानी जाती है। कंधे और सिर का भाग नाडिय़ों से घिरा होता है। गले में पहना जाने वाला हार उन समस्त नाडिय़ों को व्यवस्थित करता है। बड़ी उम्र की महिलाएं तो कांच की चूडिय़ां ही पसंद करती है, जबकि 18-40 वर्ष तक की महिलाएं लेटैस्ट फैशन के हिसाब से श्रृंगार सामग्री खरीदती हैं। सुंदरता को लेकर महिलाओं की पहली पसंद विदेशी सौंदर्य सामग्री है। रात्रि में पूरे दिन व्रत को रखकर चांद के साथ पति के दर्शन के उपरांत ही महिलाओं के द्वारा अपने व्रत को खोला गया।

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