केन बेतवा परियोजना से बुझेगी बुंदेलखंड की प्यास : चंदेल

केन बेतवा परियोजना से बुझेगी बुंदेलखंड की प्यास : चंदेल

नई दिल्ली- लोकसभा में शुक्रवार को पानी की कमी तथा इसके कारण पलायन करने वाले लाखों परिवारों की ओर से छोड़े गये मवेशियों द्वारा खेतों में फसलों को नष्ट किये जाने पर गहरी चिंता व्यक्त की गयी और क्षेत्र में जलसंकट को दूर करने के लिए केन बेतवा नदीजोड़ परियोजना को तत्काल अमलीजामा पहनाने की मांग की गयी। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर महोबा से सदस्य कुंवर पुष्पेन्द्र सिंह चंदेल ने सदन में गैर सरकारी संकल्प पेश कर इस चर्चा की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि बुन्देलखंड में पानी की उपलब्धता बढ़ जाये तो खेतों में पैदावार और पशुुओं की उत्पादकता दोनों ही बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि करीब एक हजार साल पहले बुन्देलखंड में तत्कालीन राजाओं ने 8000 से अधिक विशाल जलाशयों, तालाबों का निर्माण कराया था जो आज भी देश-विदेश के लोगों के लिए अध्ययन का विषय एवं अजूबा है। लेकिन आज बांधों एवं नहरों में पूरा पानी नहीं मिल पा रहा है। श्री चंदेल ने बुंदेलखंड के वर्तमान जलसंकट के लिए खनन माफिया को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि समाजवादी पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी के शासनकाल में माफिया ने नदियों से रेत का अंधाधुंध खनन करके उन्हें नष्ट कर दिया। इससे भूजल स्तर भी बहुत नीचे चला गया। उन्होंने कहा कि जलसंकट के समाधान के लिए खनन माफिया पर रोक लगाने की सख्त आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में नदीजोड़ो परियोजना आरंभ की थी जिसमें पहली परियोजना केन एवं बेतवा को जोड़ने की थी। 224 किलोमीटर की इस नहर से मध्यप्रदेश के छतरपुर, टीकमगढ़, निवाड़ी तथा उत्तरप्रदेश के महोबा, बांदा एवं झांसी जिलों को फायदा होगा। उन्होंने मांग की कि इस नहर से महोबा के बेलाताल, उर्मिल एवं मझवां बांधों को भी पानी दिया जाना चाहिए। इससे अनेक कस्बों एवं गांवों में सिंचाई एवं पेयजल के संकट का समाधान हो जाएगा। उन्होंने बेतवा नदी पर बैराज बनाने का भी सुझाव दिया।श्री चंदेल ने कहा कि पानी की कमी के कारण सैकड़ों एकड़ की जाेत वाले जमींदारों के परिवार पलायन करने एवं महानगरों में मजदूरी या छोटी नौकरी करने पर मजबूर हैं। पलायन के कारण उन्हें अपने घरों के पालतू मवेशियों गायों आदि को खुला छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। इनकी संख्या एक अनुमान के मुताबिक 25 लाख हो गयी है। ये पशु हिंसक हो गये हैं और ये झुंडों में खेतों में घुसकर फसल चर जाते हैं जिससे एक फसल करके कमाने वाले किसानों को दिन में खेती के काम और रात में खेतों की सुरक्षा के लिए जागना पड़ता है। इस तरह से किसानों की हालत सीमा की चौकीदारी करने वाले सैनिक के जैसी हो गयी है। उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड में दो साल से गोकुल मिशन के अंतर्गत इन मवेशियों के लिए गोशालाएं बनाने का काम शुरू हुआ है, पर केन्द्र सरकार की ओर से भी इसके लिए मदद की जरूरत है। उन्होंने कहा कि गांव का पानी गांव में और खेत का पानी खेत में योजना पर अमल करने की जरूरत है। इस संकल्प पर चर्चा के दौरान जल शक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत भी सदन में मौजूद थे।

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