योग से बुद्धि का विकास सम्भवः डा. तनेेजा

मुजफ्फरनगर। प्रसिद्ध नाक, कान, गला एवं योग विशेषज्ञ डा. महेन्द्र तनेजा ने रूहेलखण्ड मैडिकल कालेज, बरेली में योग द्वारा बुद्धि का विकास के अनूठे तथा नायाब तकनीक की जानकारी उनके समागार में दी।

डा. तनेजा ने बताया कि जब मनुष्य पैदा होता है, उस समय हर बच्चे में मस्तिष्क का वजन तथा कोशिकाओं जिन्हें न्यूरॉन कहते हैं, की संख्या या ग्रे मैटर न्यूरॉन बनता है। यह सभी में एक सा ही होता है। मस्तिष्क बांये और दायें दो भागों में होता है। अधिकांश व्यक्ति बायें मस्तिष्क से काम करते हैं, जो भाषा, गणित तथा विश्लेषण के आधर पर काम करता है। वहीं दायां मस्तिष्क रंग, चित्र, संगीत तथा भावनाओं के आधर पर कार्य करता है। दायां मस्तिष्क बायें से कई गुना तेजी से कार्य करता है। उदाहरण के लिए बायां मस्तिष्क कम्प्यूटर के रैम तथा दाया मस्तिष्क हार्ड-डिस्क की तरह कार्य करता है। अतः बायें मस्तिष्क से याद की गयी याददाश्त अस्थाई होती है, वहीं दायें मस्तिष्क की याददाश्त स्थाई होती है। मस्तिष्क का बीच का हिस्सा एक जिसे मिडब्रेन कहते हैं, के द्वारा दोनों मस्तिष्क आपस में ताल-मेल रखते हैं, इसके द्वारा स्मृति को स्थाई बनाने तथा दायें मस्तिष्क में संयम करने का कार्य किया जाता है। मस्तिष्क का उद्दीपन करने के लिए एल्पफा ब्रेन वेव को इस्तेमाल किया जाता है। इनको मस्तिष्क में त्रटक, प्राणायाम, समुचित भोजन तथा आसन विशेष द्वारा उत्पत्ति करके किया जा सकता है। त्रटक एक ध्यान की क्रिया है। जिसमें आज्ञाचक्र पर निरन्तर एक-टक दोनों नेत्रों द्वारा टक-टकी लगाकर देखा जाता है।

निरन्तर प्रयास से मस्तिष्क तथा ज्ञानेन्द्रियों का विकास होता है। डॉ. तनेजा ने बताया कि विशेष है व्यक्ति का शिथिल, आनन्दित होकर समस्त विचारों को त्याग, बन्द पलक, खुली आँखों से एक-टक निरन्तर देखना है। इसी अवस्था में छाती के स्थान पर पेट से गहरी, लम्बी, श्वास का लेना आवश्यक है। आज्ञा चक्र को चिकित्सीय भाषा में पीनियल ग्रन्थी कहा जाता है। जिससे दो हार्मोन में मैलेटोनिन तथा सीरोटोनिन का श्राव होता है।

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