श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व - श्रीकृष्ण आराधना और संतान प्राप्ति हेतु

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व - श्रीकृष्ण आराधना और संतान प्राप्ति हेतु


माहात्म्य

संपूर्ण भारत में भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है। उस दिन लोग उपवास रखते हैं। यह माना जाता है कि श्रीहरि के अवतरण काल में अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में भगवान श्रीकृष्ण के मंदिरों को विशेष रुप से सजाया जाता है. भगवान् श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा में इस अवसर पर विशेष आयोजन किए जाते है. महाराष्ट्र में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर दही हांडी प्रतियोगिता का आयोजन काफी प्रचलन में है और काफी प्रसिद्ध है। इस दिन अर्धरात्रि को मथुरा में माता देवकी की कोख से श्रीकृष्ण ने जन्म धारण करके पापी असुरों का संहार किया और भक्तों की रक्षा कर उनका उद्धार किया था।

श्री ब्रह्म वैवर्त पुराण में सावित्री द्वारा पूछने पर धर्मराज ने बताया कि भारत वर्ष में भगवान श्रीकष्ण जन्माष्टमी का जो व्यक्ति व्रत करता है, वह सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। श्रीपद्म पुराण के अनुसार जो कोई भी मनुष्य इस व्रत को करता है, वह इस लोक में तो सुख-सौभाग्य प्राप्त करता ही है साथ ही उसे इस जन्म में अभीष्ट फल की प्राप्ति भी होती है. भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो व्यक्ति जन्माष्टमी के व्रत को विधि-विधानानुसार करता है, उसके समस्त पाप स्वतः ही नष्ट हो जाते हैं और उसे मृत्यु के उपरांत बैकुंठ लोक में स्थान मिलता है। यही बात शास्त्रों में भी कही गई है।

पूजन विधि-विधान

यह व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन प्रातःकाल दैनिक नित्यकर्मों, स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेते हुए यह कहना चाहिए कि "मैं श्रीकृष्ण भगवान् की प्रीति के लिए और अपने समस्त पापों के शमन के लिए प्रसन्नता पूर्वक दिन का उपवास रखकर व्रत को पूर्ण करूंगा। अर्धरात्रि में पूजन करने के पश्चात् दूसर दिन भोजन करूंगा। व्रती को इस दिन व्रत नियमों का पालन करते हुए निर्जल व्रत रख के घरों और मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण के भजन, कीर्तन उनकी लीलाओं का दर्शन, पूजन करना चाहिए और दर्शन के समय भगवान् के लिए झूला बनाकर बालकृष्ण को उसमें झुलाया जाता है। आरती की जाती है और श्रीकृष्ण लीलाओं देखी जाती है. आरती के बाद दही, माखन, पंजीरी व उसमें मिले सूखे मेवे का मिला प्रेम से भगवान श्रीकृष्ण को भोजन कराया जाता है. प्रसाद का भोग लगाकर भक्तों में बांटा जाता है। दूसरे दिन ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देकर स्वयं भी प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है.

पौराणिक कथा

इस व्रत की कथा का उल्लेख श्रीभविष्योत्तर पुराण में इस तरह से मिलता है -

बात द्वापर युग की है। मथुरा नगरी में राजा उग्रसेन का राज्य था। उनका पुत्र कंस परम प्रतापी होने के बावजूद अत्यंत निर्दयी स्वभाव का था। उसने भगवान् के स्थान पर स्वयं की पूजा करवाने के लिए प्रजा पर अनेक अत्याचार किए। यहां तक कि पिता को कारागार में बंद कर उनके राज्य की बागडोर स्वयं संभाल ली। उसके पापाचार और अत्याचारों से दुखी होकर पृथ्वी गाय का रूप धारण कर ब्रह्माजी के पास पहुंची, तो उन्होंने गाय और देवगणों को क्षीरसागर भेज दिया, जहां भगवान् विष्णु ने यह सब जानकर कहा-"मैं जल्द ही ब्रज में वासुदेव की पत्नी और कंस की बहन देवकी के गर्भ से जन्म लूंगा। तुम लोग भी ब्रज में जाकर यादव कुल में अपना शरीर धारण करो।

जब वसुदेव और देवकी का विवाह हो चुका, तो विदाई के समय आकाशवाणी हुई-"अरे कंस! तेरी बहन का आठवां पुत्र ही तेरा काल होगा।" कंस यह सुनते ही क्रोधित होकर देवकी का वध करने पर उतारू हुआ। वसुदेव ने प्रार्थना करते हुए कहा कि वे अपनी सारी संतानें स्वतः ही उसे सौंप देंगे। इस पर कस ने उनके वध करने का विचार त्याग कर उन्हें कारागार में डलवा दिया। देवकी को एक-एक करके सात सतानें हुईं, जिन्हें कंस ने मरवा डाला। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रात्रि 12 बजे जब भगवान् विष्णु ने कृष्ण के रूप में जन्म लिया, तो चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया और उसी वक्त आकाशवाणी हुई कि शिशु को गोकुल ग्राम में नंद बाबा के घर भेज कर उसकी कन्या को कंस को सौंपने की व्यवस्था

की जाए। वासुदेव ने बालक को जैसे ही उठाया, तो उनकी और कारागार के सातो दरवाजे अपने आप खुल गए। मूसलाधार वर्षा की थी. फिर भी वसुदेव के यमुना में पहुचने पर रास्ता बन गया और नागरा ब्रज में जाकर वसुदेव ने नंद गोप की पत्नी यशोदा, जो रात्रिकाल में सलाकर, माँ यशोदा की नवजात बालिका को वापस कारागार में ले वापस आ गए। इसके पश्चात कारागार की स्थिति पहले के जैसी हो गई और देवकी और सभी पहरेदार जाग गए।

कंस ने आठवीं संतान का समाचार सुना, तो वह कारागार में पहुंचा। देवकी की गोद से बालिका को छीनकर उसे मारने के लिए जैसे ही कंस ने उस कन्या को उठाया, तभी वह हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई। आकाश से कन्या ने कहा-श्दुष्ट कंस! मुझे मारने से क्या लाभ? तेरा संहारकर्ता तो पैदा हो चुका है।श् यह सुनकर कंस ने खोज-बीन कर पता लगा ही लिया कि मेरा शत्रु गोकुल में नंद गोप के यहां पल रहा है। उसका वध कराने के लिए कंस ने कई राक्षस और असुरों को भेजा, पर उन सबका संहार भगवान् कृष्ण ने कर दिया। बचपन में उनकी अलौकिक लीलाओं ने सबको चकित कर दिया था। बड़े होने पर कृष्ण ने कंस का वध करके प्रजा को भय और आतंक से मुक्ति दिलाई। अपने नाना उग्रसेन को फिर से राजगद्दी पर बैठाया तथा अपने माता-पिता को कारागार से छुड़ाया। भगवान कृष्ण के इस दिव्य रूप का देखकर देवकी और वसुदेव उनके सामने नतमस्तक हो गए।


ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव

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