पुनर्जन्म - एक दृष्टि

पुनर्जन्म - एक दृष्टि

भगवान कृष्ण ने गीता में अर्जुन से स्पष्ट कहा है कि न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तंू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इस से आगे हम सब नहीं रहेंगे। शरीर छोडऩे के बाद प्राणी अंतरिक्ष में स्थित छह सूक्ष्म लोकों में से किसी एक में सूक्ष्म शरीर के साथ कुछ काल तक सुख दुख भोगने के लिये रहता है और फिर वापस उसी मार्ग से जिससे जाता है, वापस लौट आता है।

पंचाग्नि विद्या में बताया गया है कि जीव जब पितृ लोक या स्वर्ग इत्यादि से कर्म की समाप्ति पर निकाला जाता है तो बादलों के कणों से गुजरता हुआ पृथ्वी पर आता है और अन्न या फल में रहता है, या पानी और हवा में ही मिल जाता है लेकिन हर जीव अंतरिक्ष स्थित लोकों में नहीं जाता जैसा कि पुनर्जन्म की घटनाओं से पता चलता है कि कुछ जीव ठीक नौ माह बाद जन्म ले लेते हैं।

वास्तव में यह सब रहस्य की बातें हैं जिन को परम पिता परमेश्वर के सिवाय कोई नहीं जानता। जन्म बहुधा आस पास होता है जैसा कि पुनर्जन्म की घटनाओं से पता चलता है। फिर औरत औरत पैदा होती है और मर्द मर्द लेकिन कभी कभी जन्म बहुत दूर जा कर होता है जैसे कैनेडा, आस्ट्रेलिया या यूरोप में मरने वाला भारत में पैदा होता है या इसके विपरीत भारत के जीव उन देशों में पैदा होते हैं।

जन्मकर्मानुसार सुख-दुख भोगने, पिछले कर्ज चुकाने या बैर भाव निपटाने के लिये होता है। चूंकि जन्म अन्न या फल के माध्यम से होता है जिस जीव ने उच्च घराने में पैदा होना होता है वह ईश्वरी शक्तियों के तहत उच्च घराने के पुरूष से खाए हुए अन्न द्वारा होता है। इस प्रकार प्रकृति ने दाने दाने पर मुहर लगाई हुई है। अन्न के अतिरिक्त जीव पानी और हवा में ही मिल जाता है। फिर अन्न खाये जाने पर या पानी दिये जाते समय सांस या रोमकूपों द्वारा शरीर में दाखिल होकर वीर्य में मिल जाता है। जब यही वीर्य स्त्री के रज में मिलता है तो जीव माता के गर्भ में आता है।

छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार जब जीव चन्द्र लोक से गिराया जाता है तो ज्ञान शून्य होता है। उसे किसी तरह का भी होश नहीं होता और ईश्वरी शक्तियां उसे ऐसे ही उड़ाए फिरती हैं जब तक माता के पेट में उसे चेतना प्राप्त नहीं होती।

कुछ लोगों ने यह गलती से समझ लिया है कि जीव पांचवें महीने गर्भ में प्रवेश करता है। यह विचार सरासर गलत है। यह जीव ही तो है जो शरीर धारण करता है और प्राण शक्ति के कारण बढ़ता है। हां, इसे वह चेतना पांचवें महीने प्राप्त होती है जिस कारण वह समझ और विचार सकता है। सोया हुआ पुरूष या क्लोरोफार्म सुंघा कर बेहोशे किया हुआ पुरूष तो वही होता है जैसा कि जाग्रत अवस्था में था।

जीव अपने जन्म के संस्कार साथ लिये और अपना अगले जन्म का कार्यक्र म बनाकर चन्द्रलोक से गिराया जाता है लेकिन सोये हुए पुरूष के समान उसे कुछ एहसास नहीं होता जब तक गर्भ में उसे चेतना नहीं होती।

एक और विचार के अनुसार जीव जब वीर्य में पहुंचता है तो मर्द में हमल होकर रहता है। जब मर्द इसे स्त्री में सींचता है तो जीव का जो हमल धारण किये होता है वह उसके शरीर से निकला यानी उसने जीव को जना। इस दुनिया में इस प्रकार पिता के शरीर से माता के शरीर में आना शरीर का दूसरा जन्म है। वह स्त्री के शरीर का भाग इस नरह बन जाता है जिस तरह उसका कोई अंग हो, इसलिए उसे कष्ट नहीं देता। वह अपने अंदर आये हुए पति की आत्मा का पालन करती है।

यह गर्भ क्या है। पति के शरीर का जौहर स्त्री के शरीर में आया हुआ है। इस पति की आत्मा को औरत अपने शरीर में धारण कर जान की तरह प्यारा रखती है और पालन करती है। पिता जो बच्चे के संस्कार, पालन पोषण, शिक्षा आदि कर्म करता है, इनमें वह मां पर या बच्चे पर कुछ एहसान नहीं करता बल्कि यूं समझो कि अपना ही पालन या बेहतरी कर रहा है।

श्रुति बराबर कहती आई है कि बेटा बाप का ही स्वरूप है। जब जीव पिता के शरीर में वीर्य से दाखिल होता है तो पिता के खानपान और विचारों का उस पर प्रभाव शुरू हो जाता है। पेट में मां के विचार और संस्कार उस पर असर डालते है।

प्राय: देखा गया है कि जितने भी महापुरूष हुए हैं वे सब धर्म परायण, प्रभु भक्त, ईमानदार तथा उच्च विचारों वाले मां बाप की संतान थे। मां के पेट में शरीर इतनी तेजी से बनता है कि बुद्धि दंग रह जाती है। डाक्टरों ने प्रयोग से देखा है कि केवल पहले मास में जीव का तोल इसके वास्तविक तोल से दस हजार गुना हो जाता है और आश्चर्यजनक तरीके से खून भर जाता है। सारे अंग क्र मश: गरदन, सिर, कंधे, रीढ़ की हड्डी, पेट, पांव, पसलियां, कमर, घुटने, सब उंगलियां, नाक, कान, आंखें, दांतों के स्थानस, नाखून, गोहीय स्थान, नाभि, रोये, सिर के बाल बन जाते है।

इस प्रकार जीव गर्भ रूपी नरक की काल कोठरी में उल्टा लटक कर दुख भोगता है। अपने पूर्व जन्मों के दुष्कर्मों को याद कर पछताता है और आगे शुभ कर्म करने व प्रभु स्मरण की प्रतिज्ञा करते बाहर आता है। उस समय वह बदबूदार फोड़े से निकले हुए कीड़े की तरह होता है।

- आर. के. भारद्वाज

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