अध्यात्म: परम सत्ता हैं श्रीकृष्ण

अध्यात्म: परम सत्ता हैं श्रीकृष्ण

कृष्ण ही परम सत्ता हैं। परम ब्रह्म हैं। वही आदि हैं, मध्य व अंत हैं। अजन्मा भगवान स्वरूप हैं। अन्य कोई उन जैसा न है, न होगा। केवल और केवल एक ही भगवान हैं। वही संपूर्ण शक्तिमान, ऐश्वर्यवान, धनवान, यशवान हैं। उनसे अधिक न कोई था, न होगा।

उनके विभिन्न नाम हैं कृष्ण, पार्थसारथी, देवकीनंदन, केशव, माधव, मधुसूदन, मुकुंद हरि, जगतपति, यशोदानंदन वासुदेव, नारायण, गोविंद, रणछोड़, संकर्षण, जनार्दन, लक्ष्मीपति आदि। ये सब नाम उनके गुणों और लीलाओं पर आधारित हैं।

वे हमारे पिता परमेश्वर हैं। वे उस पिता की भांति हैं जो अपने उपद्रवी बच्चों को खेलने के लिए अलग से एक कमरा दे देते हैं ताकि वे शैतान बच्चे उनके कार्यों में बाधा न डालें अर्थात् हम सब जीव हैं शैतान बच्चे तथा यह भौतिक जगत है वह कमरा, वह कारागार जिसमें हम कैद हैं। यहां दु:ख ही दु:ख है, कष्ट हैं, बाधायें हैं। रोग, चिंतायें तथा परेशानियां हैं। इस कारागार का नियम भी है कि आप यहां सदा रह भी नहीं सकते। समय आने पर आपको ठोकर मारकर यहां से निकाल भी दिया जायेगा।

हमें उस परमपिता के पास लौटना है, अपने घर वापस जाना है। इस कैद से अपने को छुड़ाना है। जन्म-मरण के चक्कर में मुक्त होकर परम सत्य के उस धाम में उनकी सेवा में लौटना है। वही समस्त प्राणियों समस्त सृष्टि के स्वामी हैं, भोक्ता हैं। हम उनके दास हैं। उन्हें समझने के लिए हमें उस पूर्णस्रोत पर ही विश्वास करना होगा, उन्हीं की प्रमाणिक वाणी को श्रवण करना होगा।

आध्यात्मिक मामलों में प्रमाण केवल कृष्ण की वाणी का ही अनुसरण करना उचित होगा। केवल श्रीकृष्ण ही पूर्ण शिक्षक हैं। सारे वैदिक शिक्षक उन्हें ही परम शिक्षक मानते है।उन्हीं की शिक्षाओं को पढ़ाते हैं। श्रीकृष्ण भगवद् गीता में जो उपदेश देते है वह दिव्य ज्ञान है। हमें बेझिझक उसे चिन्तन व मनन करना है।

हमारा कर्त्तव्य है कि हम श्रीकृष्ण को परम भगवान मानें, उनकी पूजा करें, सेवा करें तथा नमस्कार करें। उठते-बैठते, सोते-जागते, खाते-पीते जगत के हर क्रि याकलाप करते हुए भी कभी उन्हें भूलें नहीं। सदा उन्हें स्मरण करें। उनके नाम का जप करें।

कलियुग में श्री हरि के नाम, गुण, लीला कीर्तन द्वारा ही प्रभु की प्राप्ति होगी। हरि-नाम संकीर्तन ही कलयुग का धर्म हैं। सत्य युग में ध्यान-साधना, त्रोता युग में वेद विहित यज्ञ-अनुष्ठान तथा द्वापर में श्री भगवान की सेवा द्वारा जीव धर्म स्थापन करता था परंतु कलियुगी मानव केवल नाम-संकीर्तन द्वारा अपने इष्ट श्रीकृष्ण को पा सकता हैं। प्रभु सबके हृदय में परमात्मा रूप में वास करते हैं। वे जैसी प्रेरणा देते हैं वैसे ही समस्त जगत कर्म करता है।

सब धर्मो के मानने वाले अपने-अपने शास्त्र मत के अनुसार प्रभु के नाम-गुण को मानते हैं। प्रभु सबके भावों को ही ग्रहण करते हैं। जो ईश्वर कराना चाहते हैं वही होता है। उनकी इच्छा के बिना कोई कुछ नहीं कर सकता। अपराध के अनुरूप ही ईश्वर फल भोग कराता है। मनुष्य को केवल प्रभु के नामों का जाप करना चाहिये। तभी उसके हृदय में कृष्ण-प्रेम जन्म लेगा और प्रभु कृपा प्राप्त होगी।

-सरोज कपूर

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