कष्टकारी होता है साढ़े साती शनि

कष्टकारी होता है साढ़े साती शनि

शनि ग्रह के संबंध में लोगों के मन में अनेक प्रकार की भ्रांतियां देखने को मिलती हैं। प्राय: सभी अशुभ फल के लिए शनि को ही दोषी ठहराया जाता है। शनि सौर मंडल का सबसे धीमा ग्रह है जिसे पूरे राशि चक्र में भ्रमण करने में लगभग तीस वर्ष का समय लगता है। इस तरह शनि एक राशि में करीब ढाई वर्ष भ्रमण करता है।

सामान्य सिद्धान्त के आधार पर शनि केवल चन्द्र राशि से तीसरे, छठे तथा एकादश भाव में ही शुभ होता है। इस तरह शनि अपने परिभ्रमण में केवल साढ़े सात वर्ष के लिए ही शुभ माना जाता है। अगर गोचर संचरण के इस सिद्धान्त को सही मान लिया जाय तो इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन का अधिकांश समय विभिन्न तरह की परेशानियों में व्यतीत करना होगा।

ऐसा मानना क्या वास्तविक है? वास्तव में किसी भी ग्रह के फल, ग्रह की स्थिति, अन्य ग्रहों से उसका संबंध, ग्रह के नक्षत्र, स्थिति तथा राशि में उसकी असंगत स्थिति पर निर्भर करती है। सभी प्रभाव जन्मकालिक ग्रह स्थिति चन्द्र राशि एवं जन्म लग्न के संदर्भ में ही विश्लेषित किये जाते हैं।

ग्रहों के शुभ-अशुभ फल दूसरे ग्रह की विभिन्न स्थितियों के आधार पर बाधित या परिमार्जित होते हैं। गोचर की अवधि में चलने वाली दशा, अन्तर्दशा भी फल को परिमार्जित करती है। सामान्यत: इन नियमों का विश्लेषण नहीं किया जाता और प्रत्येक अनिष्ट के लिए शनि के संचरण को ही दोषी करार दिया जाता है जो वास्तविकता से काफी दूर है। इसी संदर्भ में शनि का संचरण प्रभाव विशेषकर शनि की साढ़े साती का विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है।

जब शनि चन्द्रमा से द्वादश, प्रथम तथा द्वितीय भाव से होकर गुजरता है, तो शनि के संचरण के साढ़े सात वर्ष की अवधि को 'शनि की साढ़े साती' कहा जाता है। शनि की साढ़े साती विशेष रूप से अशुभ मानी जाती है। साढ़े साती की अवधि में बुद्धिभ्रम, शारीरिक एवं मानसिक कष्ट, अनेक प्रकार के झंझट, स्वास्थ्य हानि, धनहानि, स्थान परिवर्तन एवं सुख में कमी होती है। यह साढ़े साती का सामान्य फल है।

इसे प्रतिकूल फल इसलिए माना जाता है क्योंकि शनि चंद्रमा के आगे-पीछे भाव से गुजरते समय एक प्रकार के पापकर्त्तरी योग का निर्माण करता है और द्वादश (व्यय स्थानच्युति,) प्रथम (स्वास्थ्य हानि एवं मानसिक असंतोष) तथा द्वितीय (धन हानि एवं विवाद) के फल होते हैं। अगर शनि की साढ़े साती की अवधि में अन्य ग्रहों से प्रतिरोध हो रहा हो, जन्म के समय शनि चन्द्रमा से सप्तम या केन्द्र में हो अथवा शनि उच्च या स्वराशि का हो तो शनि साढ़े साती के विशेष प्रतिकूल फल नहीं होते।

किसी भी व्यक्ति के जीवन में शनि की साढ़े साती तीन बार तक आ सकती है। प्रथम चक्र में जब शनि की साढ़े साती होती है तो इसमें शारीरिक एवं मानसिक कष्ट विशेष होते हैं तथा परिवार में माता-पिता के लिए प्रतिकूल विवाद का समय होता है।

द्वितीय चक्र में साढ़े साती की अवधि में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन समझा जाता है तथा माता-पिता के लिए अनिष्टकारी होता है। इस अवधि में नौकरी एवं स्थान में परिवर्तन, माता-पिता से तनाव तथा परिवार में किसी स्वजन की मृत्यु की संभावना होती है। द्वितीय चक्र की साढ़े साती साधारणत: व्यक्ति के तीस वर्ष बाद आती है।

तृतीय क्र म में साढ़े साती की अवधि मृत्युप्रद मानी जाती है। इस अवधि में संतान से कष्ट, स्वास्थ्य बाधा संबंधी फल विशेष होते हैं। इस तरह जीवन के विभिन्न क्र म में शनि की साढ़े साती के अलग-अलग फल बताये गये हैं।

शनि ग्रहगोचर में केवल तृतीय, षष्ठ एवं एकादश संचरण अशुभ माना गया है। एक प्राचीन ग्रंथ के आधार पर सभी ग्रह किसी भाव विशेष में सर्वाधिक अनिष्टप्रद होते हैं। इस आधार पर सूर्य पंचम में, चन्द्रमा अष्टम, मंगल सप्तम में, बुध द्वितीय में, शुक्र षष्ठ में, शनि राशि में तथा राहु-केतु नवम भाव में विशेष अशुभ होता है। इस आधार पर शनि केवल प्रथम भाव अर्थात राशि में अशुभ होता है। इसे जन्म शनि कहा जाता है।

जन्मशनि के संदर्भ में मंत्रोश्वर ने 'फलदीपिका' नामक पुस्तक में लिखा है कि जन्म राशि से होकर जब शनि गुजरता है तब रोग, किसी की मृत्यु के कारण शारीरिक, मानसिक व आर्थिक परेशानी होती है। एक अन्य प्रामाणिक विचार के आधार पर सभी राशियों के लिए शनि की साढ़े साती के समय अशुभ फल अलग-अलग समय पर होते हैं।

उत्तर भारत में साढ़े साती का विश्लेषण अन्य संचरण के आधार पर किया जाता है। जब शनि द्वादश भाव से होकर गुजरता है तब इसका संचरण नेत्र या सिर के ऊपर माना जाता है। इस अवधि में व्यक्ति को भय तथा तरह-तरह की परेशानियां होती है।। जब शनि राशि से होकर गुजरता हो, तब इसका संचरण हृदय से माना जाता है। इस अवधि में तरह-तरह की स्वास्थ्य बाधा एवं मृत्युतुल्य कष्ट की संभावना रहती है।

जब शनि द्वितीय भाव से गुजरता हो तो इसका संचरण पैर से माना जाता है। इस अवधि में व्यक्ति इधर-उधर भ्रमण करता है तथा अपव्यय होता है। इसी पद्धति के अन्तर्गत शनि के प्रभाव का विश्लेषण अधिक सूक्ष्म रूप से विभिन्न अंगों से संचरण के आधार पर किया जाता है।

शनि के साढ़े साती के समय शुभ और अशुभ फल दोनों ही होते हैं। अशुभ फल के निवारण हेतु शनि से संबंधित पूजा-पाठ व अंगूठी धारण करना हितकर होता है।

- आनंद कुमार अनंत

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