धर्म संस्कृति: श्रद्धा और विश्वास का अनूठा स्थल: वैष्णो देवी दरबार

धर्म संस्कृति: श्रद्धा और विश्वास का अनूठा स्थल: वैष्णो देवी दरबार

वैष्णो देवी के दरबार में पहुंचते ही देश-विदेश से आए यात्री अपनी यात्र की कठिनाइयों को भूल जाते हैं। 'जय माता की' के जयघोष में हर श्रद्धालु जातिगत भेदभाव को भुला देता है। श्रद्धा और विश्वास का ऐसा संगम स्थल आपको विश्व में शायद ही कहीं देखने को मिले।

जम्मू शहर से मात्र 46 किलोमीटर की दूरी पर छोटा किंतु संपन्न कस्बा है कटरा। पर्वतों के मध्य स्थित इस कस्बे तक पहुंचने में जम्मू से पूरे दो घंटे का समय लगता है। यहां का वातावरण पूरी तरह धार्मिक भावनाओं से भरा पड़ा है। धूप और अगरबत्तियों की सुगंध से समूचा कटरा हमेशा महकता रहता है। 'चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है 'आदि भक्ति गीतों की धुन सुनाई देती रहती है।

चाहे कलकत्ता से आए हुए श्रद्धालु हों या लखनऊ, जयपुर, गोआ, मद्रास आदि भारत के किसी अन्य शहर से यहां आनेवाले, सभी एक-दूसरे को 'जय माता दीÓ कहकर अभिवादन करते हैं। श्रद्धा और विश्वास का ऐसा संगम शायद ही कहीं देखने को मिले।

धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत होकर जब श्रद्धालु कटरा से माता वैष्णो देवी बोर्ड कार्यालय से अपनी यात्र पर्ची लेकर माता के दर्शन के लिए त्रिकुटा पर्वत की 14 किलोमीटर लंबी चढ़ाई चढऩे के लिए निकलते हैं तो उन्हें सर्वप्रथम बाणगंगा नामक स्थल पर पहुंचना होता है।

बाणगंगा से ही शुरू होती है माता वैष्णो देवी की यात्रा। कहा जाता है कि आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व माता वैष्णो देवी और भैरवनाथ के बीच युद्ध के समय इस स्थल पर वैष्णो देवी को प्यास लगी थी। उस समय अपने कंठ की प्यास बुझाने के लिए माता ने धरती पर बाण चलाकर गंगा निकाली थी और इसी गंगाजल से अपने बाल धोए थे। इसी कारण इस स्थल को 'बाणगंगा' भी कहते हैं।

बाणगंगा से जब श्रद्धालु पर्यटक माता के दर्शन करने के लिए चढ़ाई आरंभ करते हैं तो वे पैदल व नंगे-पांव चलना ही पसंद करते हैं। फिर भी यदि श्रद्धालुगण पैदल चलने में असमर्थ हैं तो उनके अथवा वृद्ध और बच्चों की सुविधा के लिए यहां पर वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा निर्धारित दर पर पालकी, घोड़े और पिठुओं की सुविधा हमेशा उपलब्ध रहती है।

माता वैष्णो देवी यात्रा के अंतिम चरण अर्थात् प्रमुख मंदिर (भवन) तक पहुंचने के लिए देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं को प्रकृति के सुरम्य दृश्यों से होकर गुजरना होता है। इस दौरान उन्हें चरण पादुका, आदिकुमारी आदि तमाम छोटे-बड़े मंदिरों के दर्शन का लाभ प्राप्त होता है। यहां पर रास्ते में पडऩे वाले सभी मंदिर किसी न किसी रहस्यपूर्ण कहानी के कारण प्रसिद्ध हैं किंतु आदिकुमारी माता की गुफा, जिसे 'गर्भजून' भी कहते हैं, सबसे अधिक प्रसिद्ध है।

20 फीट लंबी इस गुफा में तीर्थ यात्रियों को कभी झुककर तो कभी लेटकर जाना पड़ता है। इसका रास्ता काफी संकरा है। इस गुफा की प्रमुख विशेषता यह है कि इसके अंदर से बच्चे, वृद्ध मोटे-पतले सभी लोग फंसकर निकलते हैं। इस गुफा के अंदर माता देवी ने भैरवनाथ से लड़ाई के समय 9 माह तक विश्राम किया था। इस कारण यह गर्भजून कहलाती है। आदिकुमारी माता के मंदिर पर स्थित इस पवित्र गुफा को भौगोलिक शास्त्रियों ने चट्टानों का अध्ययन करने के पश्चात् हजारों वर्ष पूर्व का होना बताया है।

आदिकुमारी माता के मंदिर से वैष्णो देवी की पवित्र गुफा के लिए 6,500 फीट की सीधी चढ़ाई चढऩी पड़ती है। यह क्षेत्र हाथीमत्था कहलाता है। इसके पश्चात् सांझी छत नामक स्थान आता है। यहां से माता वैष्णो देवी का दरबार कुछ ही दूर रह जाता है। मात्र के भवन पर पहुंचने के पश्चात् तीर्थयात्रियों को यात्री चेकपोस्ट पर पहुंचकर अपनी यात्रा पर्ची प्रस्तुत कर अपना गु्रप नंबर लेना पड़ता है। कभी-कभी भीड़ अधिक होने के कारण तीर्थयात्रियों का 30-40 घंटों में दर्शन का नंबर आता है। तब तक उन्हें माता के भवन के निकट स्थित धर्मशालाओं में ही रूकना पड़ता है।

यहां पर तीर्थयात्रियों के लिए नहाने-धोने से लेकर ओढऩे-बिछाने एवं खाने पीने आदि की समुचित व्यवस्था रहती है। यहां का वातावरण पूर्ण रूप से 'जय माता दी' के जयघोषों से गुंजित रहता है। जब तीर्थयात्रियों का माता के दर्शन करने का नंबर आता है तो उन्हें लंबी पंक्ति में 3-4 घंटे की प्रतीक्षा के बाद त्रिकुट पर्वत की पवित्र गुफा में प्रवेश दिया जाता है, जहां पर माता वैष्णो देवी के साथ महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की पिंडियां विराजमान हैं।

माता की इन पिंडियों के बीच से होकर पानी की तेज जलधारा प्रवाहित होती रहती है। यहां पर प्रत्येक तीर्थयात्री को प्रसाद के रूप में माता के खजाने से पैसे प्रसाद रूप में दिए जाते हैं। माता वैष्णो देवी की यात्र करने वालों की नैसर्गिक अनुभूति तो प्राप्त होती ही हैं, साथ ही उनकी मांगी गई सब मुरादें भी पूरी होती हैं।

- कर्मवीर अनुरागी

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