भवन निर्माण सामग्री और वास्तु शास्त्र

भवन निर्माण सामग्री और वास्तु शास्त्र

किसी भी भवन के निर्माण के लिए कई सामग्रियों की आवश्यकता होती है। इनमें ईंट, लोहा, सीमेंट, पत्थर, लकड़ी आदि होते हैं। वास्तु शास्त्र में विभिन्न सामग्रियों के उपयोग का विस्तृत वर्णन मिलता है। वास्तु शास्त्र में प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग अच्छा बताया गया है जबकि कृत्रिम या सिंथेटिक सामग्री को खराब। ये निर्माण सामग्रियां भी भवन के ऊर्जा प्रवाह में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

प्लास्टिक पेंट:- घरों की दीवारों पर प्लास्टिक पेंट लगाने से सभी दीवारों पर प्लास्टिक की एक परत चढ़ जाती है, जो बाहरी वायु के भवन के अंदर आदान-प्रदान में बाधक है। इस तरह वह घर या कमरा एक तरह का पॉलिथीन बैग बन जाता है। इतना ही नहीं, खूबसूरत दिखने वाले प्लास्टिक पेंट में अंतर्विहित फार्मल्डिहाइड्स भी विभिन्न रोगों का कारण बनता है। वाटर पेंट का उपयोग अधिक लाभप्रद है।

ग्रेनाइट:- इसका उपयोग रसोई के साथ-साथ पूरे घर में भी बहुतायत से किया जा रहा है किंतु यह एक रेडियोएक्टिव क्रिस्टल का एक प्रतिरूप होने के कारण अल्फा, बीटा व गामा विकिरण बहुत ज्यादा होता है जो शरीर को हानि पहुंचाता है। ऐसा भी नहीं है कि सारे ग्रेनाइट ही खराब होते हैं। ऐसे ग्रेनाइट जिनके अल्फा, बीटा गामा विकिरण 15 सी. पी. एम. से कम हों, निर्माण में प्रयोग किए जा सकते हैं।

प्लास्टर ऑफ पेरिस:- इस निर्माण सामग्री में ऋणात्मक विकिरण होता है। इसका उपयोग मानव तंत्र के लिए मानसिक तनाव का कारण बनता है।

एस्बेस्टास शीट:- इस सामग्री के फायबर हवा के घर्षण के साथ हवा में घुल जाते हैं व सांस के जरिए फेफड़ों में जाकर फेफड़ों से संबंधित बीमारियों के कारण बन सकते हैं। इस सामग्री के उपयोग से कैंसर की भी संभावना रहती है।

दीवार से दीवार तक कालीन लगाना:- इसके कारण कार्पेट के अंदर करोड़ों की संख्या में छुपे मोल्ड्स आदि कीटाणु हवा में घुल जाते हैं व वायु के द्वारा शरीर में प्रवेश कर अस्थमा का कारण बनते हैं।

विद्युत सामग्री:- आज बाजार में सस्ते व महंगे कई प्रकार की इलेक्ट्रिकल सामग्री उपलब्ध है। आम जनता सिर्फ कम कीमत के आधार पर इन सामग्रियों की खरीदारी करती है लेकिन इन सस्ती सामग्रियों की गुणवत्ता के बारे में शायद कुछ ही लोग विचार करते हैं। इन सामग्रियों से विद्युत चुंबकीय क्षेत्र निर्मित होता है, जिसका सीधा प्रभाव मानव शरीर पर पड़ता है अत: इस हेतु जागरूकता की आवश्यकता है। ऐसी विद्युत सामग्रियों का उपयोग करें जिसके ऋणात्मक विकिरणों का क्षेत्र कम से कम हो।

प्लास्टिक:- प्लास्टिक से निर्मित कालीन या चादर पर चलने से पैरों पर उस कालीन के साथ रगड़ से धनात्मक आयन की उत्पत्ति होती है जो वातावरण में विद्यमान ऋणात्मक आयनों की तरफ आकर्षित हो उसमें मिश्रित हो जाते हैं। इस कारण से वातावरण में ऋणात्मक आयनों की कमी हो जाती है। यहां यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि ऋणात्मक आयन मानव तंत्र के स्वास्थ्य हेतु आवश्यक होते हैं अत: इस तरह के कुप्रभाव प्रदान करने वाली सामग्रियों के उपयोग पर या तो रोक लगाई जानी चाहिए या उस पर हानिकारक होने की वैधानिक चेतावनी प्रकाशित की जानी चाहिए।

पेस्टीसाइड्स:- आज दुनिया के कुल उत्पादन में से 45 प्रतिशत पेस्टीसाइड्स व कीटनाशकों के उपयोग तीसरी दुनिया के देश ही कर रहे हैं। हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग 75 हजार टन पेस्टीसाइड्स का इस्तेमाल होता है। ये खाद्य सामग्री फलों, सब्जी के साथ मिलकर हमारे शरीर में प्रवेश कर कई प्रकार की बीमारियों को जन्म देते हैं।

आज विज्ञान की प्रगति के साथ-साथ बाजार में विविध प्रकार की सिंथेटिक निर्माण सामग्री उपलब्ध है व शहर के नागरिक इन नवीन सामग्रियों का उपयोग बहुतायत से कर रहे हैं। यद्यपि ये सामग्रियां दिखने में बहुत ही खूसबूरत लगती हैं व उपयोग में आसान होती हैं तथापि इनके कुप्रभावों से आमजन अनभिज्ञ हैं।

वैसे भी एक आम आदमी का यह समझ पाना कि कौन-सी सामग्री का उपयोग स्वयं व उसके परिवार के लिए फायदेमंद होगा या नुकसानदायक, बड़ी ही टेढ़ी खीर है किंतु वास्तु विज्ञान निर्माण सामग्री के विषय में स्पष्ट निर्देश देता है। पश्चिमी देशों में हो रही खोजों ने यह सिद्ध कर दिया है कि बहुत-सी प्रचलित सामग्री उस घर के रहवासियों को विभिन्न प्रकार से हानि पहुंचाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक विशेषज्ञ समिति ने 1972 में 20 देशों की सूची बनाई थी जिसमें पांच हजार से ज्यादा लोगों के मरने व जहरीले रसायनों से 50 हजार लोगों पर गंभीर असर की सूचना थी। इस सूचना के बाद 1995 में यह आंकड़ा लगभग 20 गुना अधिक रहा। अत: निर्माण सामग्री के उपयोग में अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है।

- नरेन्द्र देवांगन

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