धर्म संस्कृति: पूर्वजों का प्रियपेय-सोमरस

धर्म संस्कृति: पूर्वजों का प्रियपेय-सोमरस

हर युग में सम्पन्न लोगों ने अपने लिये कोई न कोई पेय चुना है, ऐसा पेय जिस के पीने से स्फूर्ति, तृप्ति और ताजगी मिले और काम की थकावट मिटे। प्राचीन काल में देवो और आर्यों का पसंदीदा पेय सोमरस था। इसकी चर्चा प्राचीन ग्रथों में बार-बार हुई है। ऋग्वेद में इसका प्रयोग लगभग एक हज़ार बार हुआ है। सोम का उल्लेख ऋग्वेद के अतिरिक्त देव संहिता, चण्डी कवचम, सुश्रुत संहिता, कात्यन सूत्र तथा ब्रह्यमण ग्रन्थों में विस्तार से मिलता है।

सोमरस के सेवन से जो लाभ होता है उस पर भी पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। इससे मनुष्य का कायाकल्प हो जाता है और वह लम्बे समय तक स्वस्थ जीवन जीता है। सुश्रुत के अनुसार सोम सेवन से पहले वमन, विरेचन आदि पंचक कर्म किये जाने चाहिए। सोम सेवन से शरीर के सभी विषाणु बाहर निकल जाते हैं।

ऋग्वेद ने सोम रस को अमृत तुल्य माना है। यह बल, बुद्धि और पौरूष बढ़ाने वाला तथा स्फूर्तिदायक है।

इन्द्र ने सोम रस का प्रयोग कर शक्ति को प्राप्त किया और वृत्रासुर का वध किया। सोमरस से बुद्धि तीव्र हो जाती है और मन को शान्ति मिलती है। ऋषि मुनियों को इससे वह अपूर्व शान्ति प्राप्त होती थी जो उनके ध्यान और समाधि के लिए आवश्यक थी।

इसमें मनुष्य को अमर बनाने की अद्भुत क्षमता है। औषधि के रूप में यह अंधों को दृष्टि देता है, लंगड़ों को चलने की क्षमता देता है, असाध्य रोगों को दूर करता है, स्वर तंत्री के विकास और हृदय रोगों की यह अचूक दवा है। इसके सेवन से स्वर्ग के आनन्द की अनुभूति होती है। सोमरस को सभी औषधियों का जनक माना गया है।

विचारकों, विद्वानों और वैद्यों ने बड़ी खोज और छानबीन कर यह जानने की कोशिश की कि सोमरस किस बूटी, पौधे से बनाया जाता था। काफी खोज के बाद सोमवल्ली या सोमलता का पता चला। इस के लिए अलग-अलग पौधों को सोमलता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया। सन् 1974 में गुजरात के अत्यंत दुर्गम और निर्जन स्थानों पर पत्थर की बनी भारी ओखलियां मिली। ये ओखलियां जिस पत्थर की बनी हुई थी, उस पर किसी प्रकार की जलवायु का कोई असर नहीं होता। इन ओखलियों को देख भाल परख कर यह अनुमान लगाया गया कि यह वही ओखलियां हैं जिन में सोमरस तैयार किया जाता था।

सोमरस बनाने की प्रक्रिया ऋग्वेद तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों में विस्तार से दी हुई है जिसमें इस प्रकार की विशाल ओखलियों का स्पष्ट उल्लेख है। ग्रथों में कहा गया है कि सोमरस निकालने का काम बस्ती से बाहर प्रकृति की गोद में किसी निश्चित दिन समारोह पूर्वक किया जाता था। पहाड़ों से सोमलता लाई जाती थी और ज़रूरत के मुताबिक पत्ते, जड़, डंठल निकाल कर इन का अलग रस निकाला जाता था।

सोमरस के भी कई भेद थे। कहीं कहीं सोम को पांच प्रकार का तो कहीं 24 प्रकार का बताया गया है। शुद्ध सोमरस अत्यंत तीक्ष्ण कसैले स्वाद वाला होता था जिसे सीधे रूप में पचाना भी कठिन होता था। इसलिए इस में शुद्ध जल, मधु, जौ, चावल का पानी या दूध मिलाया जाता था। सुमेर पर्वत से बहने वाले खनिज जल को भी मिलाने का वर्णन है। सोमरस बनाने की पद्धति सरल नहीं थी। इसमें हर कार्य के विशेषज्ञ होते थे। असली सोमलता के चयन में ही विशेष ज्ञान की आवश्यकता थी। फिर इस को सही ढंग से काटने, कूटने और निचोडऩे में भी विशेषज्ञों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी।

सोमरस निकालने का काम सामूहिक मंत्रोच्चारण के साथ होता था और उस समय सर्वत्र उत्सव-सा माहौल होता था। इस समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ और विद्वान ऋषि करते थे तथा सोमरस तैयार होने के उपरान्त इसे सर्वप्रथम मंत्रों के साथ देवताओं को अर्पित किया जाता था। सोमरस को सोम स्थल से बाहर ले जाने का नियम नहीं था। उस का वहीं सेवन किया जाता था। सोम रस को बचा कर नहीं रखा जाता था।

सोम समारोह का आयोजन विशेष अवसरों पर किया जाता था जैसे कोई त्योहार, नई फसल, विजयोत्सव या किसी विशिष्ट अतिथि के आगमन पर। यह आयोजन प्राय: संध्याकाल के उपरान्त चन्द्रमा के प्रकाश में किया जाता था। देवराज इन्द्र को किसी भी समय सोमरस पान का अधिकार था जो जन साधारण को नहीं था।

धीरे-धीरे सोमरस का चलन बन्द हो गया, विशेष कर देव जाति के पतन के पश्चात। इस के कई कारण थे जैसे इसके बनाने की प्रक्रिया जटिल और कठिन थी। इसको ज्यादा दिनों तक रखा नहीं जा सकता था और सोमलता भी पर्याप्त मात्र में मिलनी बंद हो गई थी। राम की अयोध्या, जनक की जनकपुरी और रावण की लंका में इसकी चर्चा कहीं नहीं हुई। असुरों ने मदिरा का सेवन शुरू कर दिया था, ऋषि मुनियों ने कई बूटियों की खोज कर च्वयनप्राश बना लिया जिस में वह सारे गुण थे जो सोमरस में थे। इस को बनाना सरल था और यह लम्बे समय तक रखा जा सकता था। यह आज भी चलन में है।

वैसे सही अर्थों में आज का सोमरस चाय है जो सस्ती सुलभ और तैयार करने में सरल है और चुस्ती, स्फूर्ति प्रदान करती है तथा हानिरहित है। यह घर घर में पूरे विश्व में राजा से रंक तक और महल से झोंपड़ी तक प्रयोग में लाई जाती है।

-आर. के. भारद्वाज

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