धर्म संस्कृति: सेवक के साथ-साथ सुत भी कहलाये हनुमान जी

धर्म संस्कृति: सेवक के साथ-साथ सुत भी कहलाये हनुमान जी

हनुमान! भक्ति का, सेवक का, एक ऐसा मील का पत्थर हैं कि जिससे भक्त और सेवक प्रेरणा ले सकते हैं। सेवक होने के साथ-साथ हनुमान प्रभु श्रीराम व माता जानकी के सुत भी कहलाये।

यूं तो हम सभी ईश्वर के पुत्र हैं लेकिन न तो सेवक हैं और न ही भक्त जैसे हनुमान थे। तिस पर स्वयं भगवान 'सुत' कह कर बुलाएं, यह गौरव का विषय है। सुन्दरकाण्ड में हनुमानजी जानकी जी को बार-बार 'मां' कहते हैं लेकिन जानकी जी पुत्र नहीं कह रही हैं-

रामदूत मैं मातु जानकी।

सत्य सपथ करूणा निधान की।।

यह मुद्रिका मातु मैं आनी।

मातु कुसल प्रभु अनुज समेता।।

अबहुं मातु मैं जाऊं लवाई।

प्रभु आयसु नहीं राम दोहाई।।

जब हनुमान के मुख से सीता जी यह सुनती हैं कि -

'कछुक दिवस जननी धक धीरा', कि मां कुछ रोज धैर्य रखें, बहुत ही शीघ्र प्रभु राम को लेकर मैं आऊंगा, तब सीताजी के हृदय में हनुमान जी के लिए वात्सल्य भाव उमड़ पड़ा और ममता की धारा फूट पड़ी तथा पूछती हैं -

'हैं सुत कपि सब तुम्ह हिं समाना।'

सुत क्या तुम्हारे ही समान हैं सब सेना में तो भला कैसे मुक्त हो पाऊंगी रावण की कैद से? 'सुत' संबोधन सुनते ही हनुमानजी गदवद् हो गये और अपना विराट स्वरूप प्रगट करते हैं-

कनक भूधराकार सरीरा।

समर भयंकर अति बलबीरा।

हनुमान का विशालकाय रूप देखकर सीताजी आश्चर्य चकित होकर सहम गईं। फिर हनुमान जी कहते हैं-

सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।

प्रभु प्रताप से गरूड़हि खाई परम लघु व्याल।।

'मां। यह बल और विशालकाय शरीर और बुद्धि देख रही हो, यह सब प्रभु श्रीराम का ही प्रताप है। इसमें मेरा अपना बल या बुद्धि कुछ भी नहीं है। अब जानकी जी को भरोसा हो गया अपने सुत हनुमान पर और अपने आपको कृतकृत्य समझने लगे हनुमान मां जानकी को प्राप्त कर।

अशोक वाटिका से लौट रहे हैं तो मां सीता चूड़ामणि देती हैं अपने स्वामी प्रभु श्रीराम के लिए। चूड़ामणि लेकर हनुमान श्री राम के पास आये, तो हनुमान के कार्य की सराहना करते हुए कहते हैं-

'सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर-मुनि-तनुधारी।।'

'कपि'। तुम्हारे समान कोई उपकारी नहीं है। राम से 'कपि' शब्द सुनकर हनुमानजी सोच रहे हैं- 'मां जानकी जी ने तो 'पुत्र' कह दिया परंतु स्वामी अभी कपि ही कह रहे हैं।' यह संबोधन सुनकर दु:ख होता है लेकिन घट-घट वासी प्रभु से भला क्या छिपा होता है? पल-पल की खबर और अंतर्मन की सोच को, भाव को वह तुरंत भांप लेते हैं और राम कहते हैं-

सुनु सुत तोहि डरिन मैं नाहीं।

देखें ऊॅं करि विचार मन माहीं।।

' हे पुत्र! तुमने मां सीता का पता लगाकर जो ऋण मुझ पर किया है, मैं उससे कभी उऋण नहीं हो सकता। मैं सदैव तुम्हारा कृतज्ञ रहूंगा।' रामजी के श्रीमुख से अपने लिए 'पुत्र' संबोधन सुनकर हनुमान तो मानो हर्ष में फूले नहीं समाए और साष्टांग दण्डवत् प्रणाम कर अपने आपको धन्य समझने लगे क्योंकि राम और सीता दोनों ने ही 'पुत्र' कह कर संबोधित किया है।

सचमुच में 'न भूतो न भविष्यत' हनुमान जैसा सेवक होना है। हनुमान जी से हमें यही शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि हम पूर्ण रूपेण अपने इष्ट के प्रति समर्पित हो जाएं और अहम् भाव का ख्याल तक न हो तथा सदैव सेवा में, ईश्वर के गुणानुवाद में और भजन अभ्यास में अपने आपको तत्पर रखें।

- आर.डी. अग्रवाल 'प्रेमी'

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