उन्नति का आधार-नाम जप

उन्नति का आधार-नाम जप

नाम जप और कर्म का समन्वय भारत के संतों की अद्वितीय विशेषता रही है। कबीर भजन और बुनकरी, नामदेव भजन और दर्जी, रैदास भजन नाम जप और मोची का काम, सेना नाम जप और नाई का काम दोनों करते थे। तुलाधर वैश्य जीवनमुक्त अवश्य थे, फिर भी वे अपना व्यवसाय और भजन दोनों साथ-साथ करते थे।

इन संतों ने अपनी रहनी, कथनी और करनी से तत्कालीन समाज को यह बताया कि नाम जप कर्म और धर्म का बेहतरीन समन्वय करता है जिससे आर्थिक लाभ एवं आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

संतों ने अपने व्यवहार के आधार पर परमार्थ का उपदेश दिया। प्रत्येक मानव को अपनी जीविका का काम करते समय नाम स्मरण अवश्य करते रहना चाहिए क्योंकि नाम स्मरण से काम में विघ्न नहीं पड़ता और काम से हरि भजन में विघ्न नहीं होता। नाम जप से काम अच्छा, ज्यादा तेजी से और निरंतर होता है। काम से नाम स्मरण एक रस और एकतान होता है और हरि भजन से काम निरंतर होता रहता है। नाम स्मरण के बिना काम बेमन, नीरस और गैर जिम्मेदारी का हो जाता है और काम के बिना नाम जप अस्थिर, सविघ्न और थोथा हो जाता है।

काम हरि भजन को स्थिर निर्विघ्न और सच्चा बनाता है। हरि भजन काम को सरस सुखद तथा उत्तम बनाता है। दोनों का समुच्चय सहज है। जब तक हरि भजन और काम सहज नहीं हो जाते तब तक यह मानव पर बंधन है, काम तब तक बेगारी है और हरि भजन पाखंड। हरि भजन से काम सहज होता है और काम से हरि भजन। ऐसी स्थिति ही सहज समाधि है। धर्म में मानव जीवन का यही एकमात्र लक्ष्य बताया गया है जिससे आर्थिक और आध्यात्मिक जीवन का परस्पर समन्वय सफलतापूर्वक होता है।

इस युग के अधिकतर संतों कबीर, नानक, तुलसी, सूरदास, रैदास, मीरा, दादू, रज्जब, नामदास, सुंदरदास, चरणदास, पलटुदास, प्राणनाथ, निश्छलदास, चैतन्य महाप्रभु आदि ने नाम जप या नाम संकीर्तन के साथ ही कर्म करने पर बल दिया है। इन संतों ने सदैव अपने कर्म के साथ ही नाम की महिमा गाई है। उन्होंने स्वयं नाम जपा व औरों को भी जपाया। अपने कर्म भी वे नाम जपते हुए ही करते थे।

इन संतों ने अपनी कथनी और करनी से समाज को आर्थिक एवं आध्यात्मिक सफलता की नई राह दिखाई। इनके अनुसार हरि भजन के लिए गृहस्थी नहीं छोडऩी पड़ती और गृहस्थी के लिए हरि भजन नहीं छोडऩा पड़ता। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों जब साथ-साथ चलेंगे तो भौतिक सफलता और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त होता जाएगा।

इस तरह कर्म करने से व्यवसाय में बरकत तो होती ही है, जीवन में आस्था के फूल भी खिलते हैं क्योंकि उनके अनुसार नाम जप में अद्भुत अलौकिक शक्तियां हैं। नाम धन परम धन है जहां से जीवन मात्र की एकता का भाव उपजता है। नाम स्मरण सहज और मानव स्वभाव के अनुकूल है।

अनवरत् नाम जप से हृदय परिशुद्ध होने लगता है। व्यक्तित्व में गहराई बढऩे लगती है। अभयदान, निर्मलता, निश्छलता, क्षमा भाव, धैर्य और संतोष के पुष्प जीवन में खिलने प्रारंभ हो जाते हैं और उनकी भीनी-भीनी महक जीवन को सुवासित करने लगती है। संपर्क में आने वाले व्यक्ति को भी इसका आभास होने लगता है। ज्ञान कहने, करने और समझने में कठिन है। प्राप्त होने पर भी उसमें अनेक विघ्न आ जाते हैं और उससे व्युत्थान हो जाता है। इसके विपरीत नाम जप समझने और करने में सरल है। उसमें विघ्न नहीं है। उससे व्युत्थान नहीं हो सकता है। इन संतों ने भक्ति को परम साध्य माना। यही एकमात्र वस्तु है। यही नाम की साधना है। भक्त प्रतिदिन भजन करता है। उसका भजन अजपाजप है। भजन के बिना वह जी नहीं सकता। यह अजपाजप है जिसके अनुसार भक्त प्रतिक्षण नाम जप करते हुए जीवन के सभी काम करता है। उपनिषद् में उल्लेख है कि जैसे तिलों में तेल, दही में घृत, स्रोतों में जल तथा अरणियों में अग्नि रहती है और तिलों के पेडऩे से, दही को बिलौने से,स्रोतों को खोदने एवं अरणियों को रगडऩे से ये प्रकट होते हैं वैसे ही नाम में असीमित अद्भुत शक्तियां निहित हैं जो निरंतर नाम जप के अभ्यास से ही प्रकट होती हैं। मुक्ति इसी लोक में मिलती है और मनुष्यों को ही मिलती है। मनुष्य होना ही मुक्ति का सोपान है। जो मनुष्य नहीं हैं, उन्हें मुक्ति नहीं मिल सकती है, इसलिए नर तन को दुर्लभ कहा गया है। इसको पाकर स्वतंत्रता प्राप्त करनी चाहिए, बंधन से मुक्त होना चाहिए और इसके लिए जीविकापार्जन के साथ-साथ रात-दिन नाम स्मरण करते रहना चाहिए, क्योंकि यह धर्म और कर्म के बीच में पुल का काम करता है। इससे ही जीव का कल्याण संभव है।

- नरेंद्र देवांगन

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