बाल कथा: पाखंडी साधु

बाल कथा: पाखंडी साधु

बहुत समय पहले किसी जंगल में एक मंदिर था। उस मंदिर में एक पाखंडी आदमी साधु के वेश में रहता था। आसपास के भोले भोले श्रद्धालु लोग उसे सचमुच महात्मा जानकर उसकी पूजा करते थे। वे तरह तरह के कीमती उपहार, भोजन, कपड़े और रूपये आदि लेकर उसके दर्शन करने जाते थे।
उस कपटी साधु के कई मुस्टंडे चेले थे। वे भी उसी की तरह ढोंगी और बदमाश थे। साधु अपने भक्तों द्वारा दिये गये सामान में से अच्छी अच्छी चीजें तो अपने पास रख लेता था और बची खुची चीजें अपने चेलों में बांट देता था। दर असल चेले साधु के एजेंट थे। वे कस्बे में भिक्षा लेने जाते और बाबा के चमत्कारी होने का झूठा प्रचार करते थे। सभी नशे के आदी थे।

एक दिन एक धनी सौदागर अपनी पत्नी और सुन्दर जवान पुत्री के साथ साधु महाराज के दर्शन के लिये आया। ढोंगी साधु कन्या के रूप यौवन को देखकर उस पर मोहित हो गया। वह कन्या से विवाह के सपने देखने लगा।
साधु कपटी और बदमाश तो था ही, उसने एक प्रपंच रचा। वह सौदागर को एकांत में ले गया और उससे बोला बच्चा! मैं स्पष्ट देख रहा हूं कि तुम्हारे ऊपर बहुत बड़ा संकट मंडरा रहा है, कुछ समय से तुम्हारा कारोबार भी ढीला चल रहा है। यही उसी का संकेत है। संकट की चेतावनी देने ही मैं तुम्हें एकांत में लाया हूं। मुझे तुम्हारी पुत्री के विषय में कुछ बताना है। इस समय उसकी आयु कितनी है? सौदागर ने चिंतित स्वर में कहा-दो दिन के बाद अठारह वर्ष की हो जायेगी महाराज।
बस उन्नीसवां वर्ष आरंभ होते ही आपकी पुत्री के अनिष्टकारी ग्रह आप पर बहुत भारी पडऩे लगेंगे। आप पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ेगा। मृत्यु योग भी है। ढोंगी बाबा ने सौदागर को भयभीत कर दिया।
हे महात्मा, आप तो अंतर्यामी है। कृपा करके मुझे ऐसा उपाय बताइये। जिससे मैं और मेरा परिवार शांतिपूर्वक और सुखी रहे। सौदागर बहुत घबरा गया था।
इसका एक ही उपाय है तुम उसे यह प्रसाद की पुडिय़ा खिलाकर एक बड़े से टोकरे में बिठाकर आज ही रात को नदी में बहा देना। टोकरे के ऊपर एक दीपक जलाकर रख देना। साधु ने बताया।
मृत्यु और टूटते संकटों के पहाड़ के भय से सौदागर ने पुत्री मोह त्याग दिया और ढोंगी साधु से बोला-ठीक है गुरू देव, आज रात मैं ऐसा ही करूंगा।
साधु के कहे अनुसार रात्रि के समय सौदागर ने पुत्री को पुडिय़ा वाला प्रसाद खिलाया। खाते ही वह बेहोश हो गई। सौदागर ने उसे टोकरी में बैठाकर नदी में प्रवाहित कर दिया।
रात्रि के पहले पहर में निकट के राज्य का राजकुमार जो जंगल में शिकार खेलते हुए राह भटक गया था, उसी ओर से अपने साथियों के साथ नदी पार कर रहा था। तभी उसकी दृष्टि बहते हुए टोकरे पर पड़ी जिस पर एक दीपक टिमटिमा रहा था।
राजकुमार ने टोकरे को रोक लिया और खींचकर तट पर ले आया, जब उसने टोकरी को खोला तो आश्चर्च चकित रह गया। उसमें एक अप्सरा जैसी कन्या थी। वह बेहोश थी। राजकुमार ने टोकरे से उसे निकाल कर अपने घोड़े की पीठ पर लिटा लिया।
संयोग की बात है कि राजकुमार के पास एक मोटा भयंकर बन्दर था जो उसने जंगल से पकड़ा था। बंदर उस समय भूखा और क्र ोधित था। राजकुमार ने उस बन्दर को टोकरे में बन्द करके नदी में छोड़ दिया और जलता हुआ दीप भी उस पर रख दिया और उस सुंदर कन्या को साथ लेकर चल दिया।
शाम के समय से ही कपटी साधु बड़ी उत्सुकता से दीपक वाले टोकरे की प्रतीक्षा कर रहा था। जैसे ही टोकरा बहता हुए उसे दिखाई पड़ा तो उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उसने अपने चेलों को तुरंत नदी में कूदकर टोकरा पकडऩे को कहा। चेलों ने टोकरा पकड़ लिया और उसे उठाकर कमरे में रख दिया।
चेलों के चले जाने के बाद साधु ने फटाफट टोकरे को खोला उसमें भयानक बंदर पहले से क्र ोधित और भूखा फडफ़ड़ा रहा था। उसने एक दम उछलकर साधु के मुंह पर हमला कर दिया और एक झपटे में उसने नाक और आंख और दूसरे में साधु के कान साफ कर दिये। पाखंडी साधु पागलों की तरह चिल्लाता हुआ इधर-उधर भागने लगा। इसके बाद वह कभी भी मंदिर के आसपास दिखाई नहीं पड़ा।
राजकुमार का विवाह सौदागर की कन्या से हो गया। वह हंसी-खुशी रहने लगी। सचमुच अपराधी को दंड मिलता है और नेक और सच्चा इन्सान सम्मान पाता है।
- परशुराम संबल

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