बच्चों का मनोबल न गिराएं

बच्चों का मनोबल न गिराएं

हर बच्चे का स्वभाव प्राकृतिक रूप से भिन्न होता है कोई बच्चा भावुक, अति भावुक, मस्त, बात को सुनने और मानने वाला और कोई सुनकर अनसुना करने वाला होता है पर कभी कभी बच्चे ऐसे हालत बना देते हैं कि माता-पिता को उन्हें डांटना पड़ता है या कठोर शब्दों का प्रयोग करना पड़ता है जिसका प्रभाव बच्चे के कोमल ह्नदय पर पड़ता है। बच्चों के साथ कठोर शब्दों का प्रयोग न कर उन्हें प्यार से समझाना ही बेहतर होता है ताकि उनका कोमल हृदय आहत न हो। अगर आप भी कुछ ऐसे वाक्य बोलते हैं तो समय रहते स्वयं को सुधारने का प्रयास करें।

जो भी फैसला लेते हो, गलत लेते हो:-
बहुत कम बच्चे उम्र के साथ सही फैसला ले पाते हैं। छोटे छोटे फैसले उन्हें लेने को कहें, अगर फैसला सही न ले पा रहा हो तो उसे कभी भी अहसास न कराएं कि उसका हर फैसला गलत होता है। बच्चों का वह समय सीखने का है। अगर हम उसे बार बार गलत फैसला लेने का अहसास कराएंगे तो वह फैसला लेना ही छोड़ देगा। ऐसा करने से उसका मानसिक विकास रूक जाएगा। उन्हें फैसला लेने के लिए प्रोत्साहित करें और उन्हें सिखाएं कि फैसला लेते समय किन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
तुम्हें स्वयं पर शर्मिन्दा होना चाहिए:-
विशेषकर परीक्षा परिणाम के समय या किसी कंपीटिशन में बच्चे अगर कुछ पीछे रह भी जाए तो अक्सर माता-पिता के मुख से निकल जाता है - तुम्हें शर्म आनी चाहिए, क्या रिजल्ट है तुम्हारा? अपने मित्रों को देखो। यह शब्द बच्चे के मन मस्तिष्क पर प्रभाव डालते हैं और बच्चा मानसिक तनाव ग्रस्त हो सकता है। बच्चे को समझाएं अगली बार मेहनत कर आगे निकलना है। जहां कमी लगे, उसे प्यार से समझाएं ताकि वह उत्साहित हो अपना ध्यान पढ़ाई या खेल कूद में सही तरीके से लगा सके।
मैं तुम्हारी उम्र में ज्यादा जिम्मेदार था:-
बच्चे कीे तुलना कभी स्वयं से न करें, बच्चें दुखी होकर, गुस्सा अंदर ही पीते हैं और धीरे धीरे बच्चों के मन में मामता-पिता के प्रति इज्जत भी कम होने लगती है। अक्सर माता-पिता के मुंह से निकल जाता है मैं तुम्हारी उम्र में यह कर लेता था, वो कर लेता था तुम तो बस लापरवाह हो। अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझते। इस वजह से बच्चा हीन भावना का शिकार हो सकता है और कांफिडेंस भी कम हो सकता है। कभी भी स्वयं से या अन्य से बच्चे की तुलना बच्चे के सामने न करें।
- मेघा

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