बाल कथा: पकड़ा गया महाआलसी

बाल कथा: पकड़ा गया महाआलसी

- परशुराम संबलबैठे हुए व्यक्ति ने बड़ी लापरवाही से ऊंघते हुए कहा- 'बेकार में ही कौन उठकर खड़ा होगा। हम तो बस ऐसे ही ठीक हैं।' बस, महाआलसी का पता लग चुका था। महा आलसी को नौकरी से हटाकर उसी दिन से सेठ ने कामगारों पर काम के समय निगरानी बढ़ा दी। सच है आलस उन्नति के पथ का बाधक है।
फिर क्या था, विशेषज्ञ की बात सुनकर सारे कामगार उठकर खड़े हो गये'। केवल एक ही कामगार ऐसा था जो बैठा ही रहा। विशेषज्ञ ने उस बैठे हुए व्यक्ति से पूछा-'क्यों भाई, तुम्हें ये सारी बातें मंजूर नहीं हैं क्या?'

फिर भी एक और प्रयत्न करते हुए विशेषज्ञ ने दूसरा पासा फेंका, कहा-देखो, जो भी तुम लोगों में अपने आपको सबसे बड़ा आलसी समझता हो, वह स्वेच्छा से चुपचाप उठकर खड़ा हो जाये क्योंकि सेठ जी ने यह तय किया है कि सारी सुविधाओं के साथ उसे पांच हजार रूपये नकद दिये जायेंगे। उसके वेतन में भी वृेि की जायेगी।''
कोई दूसरा उपाय नजर नहीं आ रहा था।
कहकर विशेषज्ञ ने भीड़ की ओर निहारा लेकिन देखकर बड़ी निराशा हुई। इस कथन की किसी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई थी। सब वैसे ही चुपचाप बैठे थे। विशेषज्ञ असंमजस में पड़ गया।
फैक्ट्री के सारे कामगारों को इकटठा किया गया। विशेषज्ञ ने उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा-सेठ जी ने एक मज़ेदार बात सोची है। वह बात यह है कि उनकी फैक्ट्री में जो भी कामगार अपने आपको महाआलसी मानता हो और इसे साबित करके दिखाये तो उसे इनाम दिया जायेगा। फैक्ट्री में हल्के से हल्का काम करने को दिया जायेगा। उसके वेतन में भी किसी तरह की कटौती नहीं की जायेगी। साथ ही साथ उसके फैक्ट्री आने जाने के समय में ढील दी जायेगी। तुममें से जो भी अपने आपको महाआलसी मानता हो, वह उठकर खड़ा हो जाये।
सेठ जी की समझ में नहीं आ रहा था कि समस्या को कैसे सुलझाया जाये? फैक्ट्री के कामगारों की छंटनी करना भी आसान नहीं था। मजदूर यूनियन आन्दोलन कर सकती थी। एक दिन सेठ जी ने फैक्ट्री के प्रबन्धक और दूसरे प्रशासनिक अधिकारियों की आवश्यक बैठक बुलाई। समस्या पर गहराई से विचार विमर्श किया गया। काफी विचार विमर्श के बाद भी कोई हल निकलता दिखाई नहीं पड़ा। आखिरकार सेठ जी ने हारकर बाहर से कुछ श्रम विशेषज्ञों को बुलवाया और उन्हें पूरी खोज बीन करके समस्या का हल बताने को कहा। विशेषज्ञों ने स्थिति को जांचा-परखा और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सारी गड़बड़ फैक्ट्री के किसी महाआलसी कामगार के कारण पैदा हुई है। एक कहावत है कि एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर देती है। देखा देखी उस महाआलसी का असर दूसरे कामगारों पर भी पडऩे लगा। विशेषज्ञों ने सेठ जी को परामर्श दिया कि अगर उस महाआलसी का पता लगाया जाये जो इस सारे कारण की जड़ है तो स्थिति को सुधारा जा सकता है।
सेठ अमर चन्द शहर के जाने माने उद्योगपति थे। कुछ दिनों से सेठ जी इस बात को लेकर बहुत परेशान थे कि अच्छी खासी चलती चलाती फैक्ट्री में उत्पादन अचानक दिनों दिन गिरता जा रहा था। जाने क्या हुआ कि फैक्ट्री में काम करने वाले मेहनती कामगार कामचोर, आलसी और निकम्मे हो गये थे। माल पूरा और समय पर तैयार न हो सकने के कारण बाज़ार में साख गिर रही थी। व्यापार में घाटा होने लगा था।

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