बाल कथा: हरियल पक्षी

बाल कथा: हरियल पक्षी

बहुत पुराने समय की बात है, एक किसान के खेत के पास एक बटेर रहती थी। उसका नाम था बिटूली। बिटूली बटेर बहुत सुंदर थी और गाती भी खूब सुरीला थी पर वह इतनी ही नकचढ़ी भी थी। उसे अपनी सुंदरता और गायन कला का बड़ा घमंड था। गुस्सा उसकी नाक पर धरा रहता था।
बात-बात पर वह दूसरों का अपमान करती थी। किसी को वह भौंडा और बदसूरत कहकर हंसती तो किसी को बेसुरा। कोई और बटेर गाने की कोशिश करता तो उसका सुर छिड़ते ही वह हंसते-हंसते दोहरी होकर कहती, 'सत्यानाश अरे, तुम रहने दो, रहने दो, मत गाओ। बस, मेरा गाना सुनो, तुम्हारे लिए इतना ही बहुत है।'
जब वह बटेर यौवन काल में थी तो बहुत से अन्य पक्षी उससे दोस्ती करना चाहते थे, उसके साथ घोंसला बनाना चाहते थे पर उसने अपने गर्व में चूर होकर किसी की ओर ध्यान नहीं दिया। जो भी उससे दोस्ती करना चाहता, वह गर्दन नचाकर उसी का मजाक उड़ाती और गर्व से फूली रहती। यह देखकर सब दूर-दूर छिटक जाते।
सभी हैरान होकर कहते, 'यह बिटूली बटेर है तो सचमुच सुंदर पर इसका मन कितना काला है। इसकी हर बात में घमंड चू रहा है।'
इस पर बटेरों की बुजुर्ग पड़दादी कहती, 'चिंता मत करो, हर दिन एक जैसा नहीं होता। कभी न कभी तो समय बदलेगा और वही बदला हुआ समय इस बिटूली का इलाज करेगा। समय अच्छे-अच्छों को दुरूस्त कर देता है।'
यह बात बिटूली बटेर को सुनाई पड़ती तो वह ही-ही करके हंसते हुए कहती, 'अरे, समय तो मेरी मुटठी में है। समय मुझे क्या सिखाएगा? दादी नहीं जानती कि ईश्वर ने मुझे सबके दिलों पर राज करने के लिए पैदा किया है। मैं सुरों की महारानी हूं, महारानी।'
कहकर वह कोई मीठा और सुरीला गीत छेड़ देती। उसे सुनते ही सब मुग्ध होकर कहते, 'सचमुच बिटूली बटेर के गले का जवाब नहीं।' और बिटूली खिलखिलाकर हंसने लगती।
पर बुजुर्ग दादी की बात सही थी। धीरे-धीरे बिटूली का यौवन-काल बीत रहा था। एक नवयुवक पक्षी हिंगल जिसके पंखों ने अभी पूरा आकार नहीं लिया था और उनमें पूरे रंग भी नहीं खिले थे, उसके पास आया और उसके सामने दोस्ती का प्रस्ताव रखा पर घमंडी बटेर ने बुरी तरह उसका मजाक उड़ाया और उसे भगा दिया।
कुछ दिन बाद हिंगल के पंखों का हरा चटख रंग खिल आया और उसकी आवाज भी मधुर हो गई। पूरी घाटी में उसकी स्वर लहरियां गूंजने लगीं। हर बटेर की इच्छा होने लगी कि उससे दोस्ती हो जाए। सब प्यार से उसे हरियल पक्षी कहकर पुकारने लगे।
अब तक सुरीला गाने वाली घमंडी बटेर बिटूली का घमंड भी धीरे-धीरे टूट रहा था। एक दिन उसने खुद ही उस सुंदर हरियल पक्षी की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो हरियल ने यह कहते हुए मना कर दिया कि अब बहुत देर हो चुकी है। अब बाकी दूसरे पक्षी भी घमंडी बटेर बिटूली का खूब मजाक बनाने लगे थे। वह जहां भी जाती, सभी उसकी खिल्ली उड़ाते। बटेर बड़ी शर्मिंदा होती। उसे लगता, कोई उसे देखे नहीं, वह सबसे छिप जाए।
आखिर उसे एक उपाय सूझा। उसने खेत के पास पड़े घास-फूस के ढेर के पास अपना घोंसला बना लिया पर दुर्भाग्य ने यहां भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। एक हरे टिड्डे की नजर उसके घोंसले पर पड़ गई। उसने सभी पक्षियों को बता दिया कि बिटूली बटेर ने घास-फूस के पास जमीन पर ही घोंसला बना लिया है। फिर से सभी उसका मजाक बनाने लगे।
वह हरियल पक्षी आज भी खूब मस्ती में मधुर गीत गाता है, सारे पक्षी सुनते हैं और खुश होते हैं। सिर्फ जमीन पर रहने वाली वह एकाकी बटेर ही अपने आप पर कुढ़ती और पछताती रहती है कि क्यों उसने घमंड में चूर होकर उस हरियल पक्षी का मजाक उड़ाया था और उसके साथ दोस्ती से इंकार कर दिया था।
- नरेंद्र देवांगन

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