बाल कथा: जहां चाह, वहां राह

बाल कथा: जहां चाह, वहां राह

विक्रमगढ़ में राजा विराट राज्य करते थे। वे बहुत ही दयालु एवं न्यायमित्रा राजा थे। प्रजा के हर सुख-दुख का पूरा ख्याल रखते। प्रजा के कष्टों को जानने के लिए वे अपने प्रधानमंत्री हिमांशु के साथ रात्रि में भेष बदलकर घूमने निकला करते थे।

एक दिन अपने नियम के अनुसार राजा विराट अपने प्रधानमंत्री के साथ घूम रहे थे। वे घूमते-घूमते राजधानी से दूर एक गांव में पहुंचे। वहां उन्हें एक झोपड़ी दिखाई दी जिसके अंदर से दो लोगों के बीच बातचीत होने की आवाज आ रही थी। राजा विराट वहीं पर ठिठक गए। फिर वे दोनों आगे बढ़कर अंदर का दृश्य देखने की कोशिश करने लगे।

घर के पिछवाड़े की तरफ एक खिड़की थी जो खुली हुई थी। उससे अंदर का हृदय साफ-साफ नजर आ रहा था। एक बुढिय़ा चटाई पर बैठी थी एवं एक लड़का खाट पर बैठा था। घर में नाम मात्रा के सामान थे। दीपक की टिमटिमाती लौ में ही राजा एवं प्रधानमंत्री ने उस खिड़की के सहारे पूरे घर का मुआयना कर लिया। वे अब तक समझ चुके थे कि ये दोनों मां-बेटा हैं और इनकी आर्थिक स्थिति बहुत ही जर्जर है।

'बेटा, शहर जाकर तुम पढ़ाई करना चाहते हो। यह तो मेरे लिए खुशी की बात है पर बेटा।'

'पर क्या मां, यही न कि हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं।'

'हां बेटा। तुम तो जानते ही हो कि मैं दाई का काम गांव के लोगों के घर में कर तुम्हें हर संभव पढ़ाई-लिखाई करने में सहायता की पर शहर में पढ़ाई करना बहुत खर्चीला है। हम बदनसीब-गरीबों को उच्च पढ़ाई भाग्य में नहीं लिखी है, बेटा। मैं यह मानती हूं कि तुम्हें पढऩे का बहुत शौक है। पढ़ाई के प्रति असीम लगन है और इसी के कारण तुमने हर परीक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त किया। तुम्हें अपने प्रधानाध्यापक जगदीश बाबू का सहयोग मिला पर हर जगह जगदीश बाबू जैसे लोग तो नहीं होते। बेचारे मास्टर जी का पुत्रा जिए हजारों साल जिन्होंने तुम्हें हर संभव सहायता की।

'परन्तु मां उन्होंने ही तो हमें आगे पढ़ाई करने की सलाह दी है और मां, अब मैंने भी ठान लिया है कि शहर जाकर मैं पढ़ाई करूंगा, जरूर करूंगा। इसके लिए मुझे कठिन मेहनत ही क्यों न करनी पड़े।'

'ठीक है रामू लेकिन अब रात काफी गहरी हो गई है। हमें सोना चाहिए।

'अच्छा मां, अरे हां, मैं तो बताना ही भूल गया था कि मास्टर साहब के एक रिश्तेदार शहर में रहते हैं। उनका राज-दरबार में आना-जाना रहता है। वे हमें सरकारी कोष से पढऩे के लिए मदद दिलवाने की कोशिश करने के लिए कहेंगे। मास्टर साहब कह रहे थे कि हमारे राजा बहुत ही दयालु हैं। वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।

'हां रामू बेटा, उन्होंने ठीक ही कहा है। लगता है, हमारा भाग्योदय एक दिन जरूर होगा। अच्छा बेटा, अब सो जा।'

'अच्छा मां, तुम्हें भी तो जल्द ही उठना होता है।' अगले दिन कुछ सैनिक उस बुढिय़ा के घर पहुंचे। एक सैनिक ने कहा-'बुढिय़ा मां, तुम्हें अपने बेटे के साथ राजा साहब ने राजदरबार में हाजिऱ होने को कहा है।'

लेकिन बेटा राजा ने हमें क्यों बुलाया है। कहीं मुझसे अनजाने में कोई अपराध तो नहीं हो गया।

'हम लोगों को यह सब मालूम नहीं। आपको अभी चलना होगा, हमारे साथ चलिए। सैनिक उन दोनों को ले राज दरबार में हाजिऱ हुए।'

राजा ने कहा-'रामू, तुम आगे पढ़ाई करना चाहते हो।' 'हां, राजा साहब।'

'तो ठीक है, तुम्हें सरकारी सहायता जरूर मिलेगी परन्तु तुम्हें अपनी पढ़ाई पूरी लगन एवं निष्ठा से करनी होगी। तब तक तुम्हारी मां इस राजदरबार में ही नौकरानी का काम करेगी।'

'हमें मंजूर है' मां-बेटा ने एक साथ कहा।

और रामू की मेहनत व लगन ने अपना रंग भी दिखाया। उसने हर परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। शिक्षा पूरी होने के बाद राजा ने उसे अपना मंत्री नियुक्त कर लिया। सच ही कहा गया है-'जहां चाह, वहां राह।'

- चन्द्र प्रकाश अम्बष्ट

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