बाल जगत/जानकारी: जन्म कथा डाक टिकट की

बाल जगत/जानकारी: जन्म कथा डाक टिकट की

आज रंग-बिरंगे डाक टिकट प्रचलन में हैं। हर देश डाक टिकट छापता है। ब्रिटेन के डाक टिकट पर उसके देश का नाम अंकित नहीं होता जबकि डाक टिकट का जन्मदाता ब्रिटेन ही है। डाक टिकट कैसे अस्तित्व में आया, आइए इस बारे में जानें।

बात 1835 की है। इंग्लैंड के एक अध्यापक और समाज सुधारक रोलेंड हिल को लगा कि डाक व्यवस्था कुछ अरुचिकर, थोड़ी सी जटिल है इसलिए उसकी आय भी कम है। इसमें कुछ बदलाव हो तो इससे लोग आकर्षित होंगे जिससे विभाग की आय भी बढ़ेगी। उसने कुछ सुधार के उपाय लिखे और उन्हें पर्चे में लिखकर सार्वजनिक कर दिया।

उसमें एक सुझाव यह भी था कि डाक विभाग कागज के छोटे-छोटे लेबल जारी करे जिसे लोग मनचाहे आकार के अपने लिफाफों पर चिपकाकर उसे डाक में डाल सकें। चिपकाने के लिए लेबल के पीछे गोंद लगा हो।

सरकार को उनके कुछ सुझाव पसंद आए और लेबल यानी डाक टिकट तैयार करने का काम हिल के निर्देशन में कराने का फैसला किया गया। डाक टिकट जारी करने की तिथि 10 जनवरी 1840 निर्धारित की गई। सरकारी सुस्ती के चलते इस दिन तक टिकट का खाका (डिजाइन) भी तैयार न किया जा सका।

फिर रोलेंड हिल ने ही इसके प्रयास प्रारंभ किए। उन्होंने एक प्रतियोगिता आयोजित कर डिजाइन आमंत्रित किए। उन्हें करीब ढाई हजार डिजाइन प्राप्त हुए पर हिल को एक भी पसंद नहीं आया। फिर एक चित्रकार हेनरी कारबोल्ड को सुझाव देते हुए डिजाइन बनाने का अनुरोध किया।

कारबोल्ड की इच्छा थी कि टिकट के पाश्र्व में यह चित्र अंकित किया जाए जो महारानी के राज्याभिषेक का था जिसे 9 नवंबर 1837 को जारी एक पदक पर अंकित किया गया था। इस काम में हेनरी ने मदद ली एक अन्य कलाकार व्योन के। मूलरूप से इंग्लैंड के प्रथम डाकटिकट को वस्तुत: व्योन ने ही डिजाइन किया।

डिजाइन लेकर हिल एक प्रमुख मुद्रण कंपनी मै? परकिंसन एंड कंपनी के मालिक जैकब परकिंसन से मिले। परकिंसन ने छापना मंजूर किया और प्रति एक हजार टिकट के लिए साढ़े सात पैंस मूल्य देना तय हुआ। परकिंसन एंड कंपनी के ब्लॉक मेकर फ्रेडरिक हीथ ने डिजाइन का ब्लॉक बनाया। इसकी कीमत एक पैनी रखी गई।

उस समय तक किसी और देश में डाक टिकट अस्तित्व में नहीं आए थे। शायद इसलिए या फिर भूलवश टिकट पर ब्रिटेन अर्थात टिकट जारी करने वाले देश का नाम अंकित नहीं किया गया। यह टिकट 6 मई 1840 को जारी हुआ। यह टिकट आधा औंस वजन तक के लिफाफों के लिए था। इस टिकट को जनता ने खूब खरीदा।

काले रंग में छपा यह प्रथम टिकट खूब चल निकला तो समस्या यह आई कि आधे औंस से अधिक के वजन के लिए क्या किया जाए। शायद यह बात किसी के दिमाग में नहीं आयी कि अधिक वजन के लिए एक के स्थान पर दो टिकट लगा दिये जाएं। फिर एक अन्य टिकट दो पैनी का जारी किया गया जो नीले रंग का था।

इन पहले दो टिकटों को कागज की एक शीट पर कई-कई की संख्या में छापा तो जाता था पर वह पूरी शीट डाकघरों को नहीं दी जाती थी बल्कि टिकटों को अलग-अलग काटकर आपूर्ति की जाती थी। आज की तरह टिकट के चारों ओर छिद्रण नहीं किया जाता था।

टिकट पर महारानी विक्टोरिया का 18 की वर्ष आयु का चित्र डाक टिकटों पर छपता था। सन 1840 में जब पहला टिकट छपा, तब महारानी की उम्र 21 वर्ष थी। बाद में टिकट पर महारानी के अधिक उम्र के नये चित्र छापने की बात उठी तो महारानी ने कहा कि नया नहीं, वही पहला चित्र छपते रहने दिया जाए। इस कारण 60 वर्ष तक वह टिकट छपता रहा।

हां,1840 में जब काला डाक टिकट प्रचलन में आया तो डाकखानों में एक समस्या आयी। डाकखाने में मोहर शुरू से आज तक काली स्याही से ही लगती है तो उस काले टिकट पर मोहर स्पष्ट नहीं हो पाती इसलिए पहले एक पैनी वाले टिकट को लाल रंग में 'पैनी रेड' नाम से छापा गया 1841 में। सन 1840-41 में जब इंग्लैंड में डाक टिकट लोकप्रिय थे और इनके जन्मदाता रोलेंड हिल का नाम दुनिया के कोने-कोने में पहुंच चुका था तब भी अन्य देशों ने डाक टिकट जारी करने में जल्दी रुचि नहीं दिखाई।

इंग्लैंड के बाद अमेरिका ऐसा दूसरा देश था जिसने डाक टिकट को अपनाया मगर अमेरिकी सरकार ने ऐसा नहीं किया था। आज की कुरियर सेवा की तरह 1842 में अमेरिका में एक निजी डाक सेवा 'सिटी डिस्पैच पोस्ट' ने जार्ज वाशिंगटन का चित्र वाला एक निजी डाक टिकट जारी किया।

डाक टिकट चलाने वाला अगला देश था अमेरिका का पड़ोसी देश ब्राजील जिसने बैल की आंख के डिजाइन वाले एक साथ तीन डाक टिकट (क्र मश: ब्राजीली मुद्रा रीस 30, 60 और 90) जारी किए। इसके बाद 1843 में ही स्विटजरलैंड के ज्यूरिख प्रदेश ने डाक टिकट जारी किया। फिर जेनेवा ने फिर बेसेल (स्विटजरलैंड) ने।

1 जुलाई 1845 से अमेरिका में सरकारी डाक सेवा की स्थापना हुई प्राइवेट कंपनी को खरीदकर।

न्यूयॉके के पोस्ट मास्टर आरएच मॉरिश ने डाक टिकट निकाला। फिर कई बड़े शहरों के पोस्टमास्टरों ने डाक टिकट निकाले। अमेरिकी सरकार ने हर डाकखाने में बिक्री और उपयोग के लिए 1 जुलाई 1847 को 5 एवं 10 सेंट वाले (फ्रेंकलिन रूजवेल्ट और जॉर्ज वाशिंगटन के चित्र वाले) दो डाक टिकट जारी किए क्योंकि सरकार 1 जुलाई 1845 को देश भर में एक समान डाक दरें लागू कर चुकी थी। भारत में डाक सेवा की शुरूआत अंग्रेजों ने की।

- अयोध्या प्रसाद भारती

Share it
Top